शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)
Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै ॥२॥ आत्मविद्या और तपही जिसका मूल साधन है, जो उपनिषदोंका मुख्य तात्पर्य है, जो मूर्तिरहित सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा अर्थात् सब जीव जिसके अंश हैं, जो कारण का कारण अदृश्य स्वरूप है ॥३॥ जो अतिसूक्ष्म और इन्द्रियोंसे अग्राह्य है वह ब्रह्म ग्राह्य कैसे हो सकता है, उस सूक्ष्ममे चित्तकी वृत्ति किस प्रकार हो सकती है, यह मुझे संदेह है इसी से बुद्धि व्यग्र है इसका उपाय आप वर्णन कीजिये ॥४॥ श्रीभगवानुवाच । श्रीशिवजी बोले- हे महाभुज रामचन्द्र! सुनो मै इस विषयमें उपाय कहता हूँ प्रथम सगुण उपासना करते २ चित्त को एकाग्र करे और स्थूलसौरौंभिकान्यायसे निर्गुण स्वरूपमें चित्तकी वृत्ति प्रवृत्ते करे, स्थूलसौरौंभिकान्याय इसको कहते हैं कि, प्रियमनुष्यको जिस प्रकार मृगजलं दिखाकर रवि यथार्थ जल है ऐसा प्रतारणासे बुलाकर फिर वास्तविक जल दिखाते है, इसी प्रकार प्राणीको प्रथम साधनादि का उपदेश कर पीछे ब्रह्मज्ञान कथन करते है ॥५॥ और इस प्रकार जाने कि इस अन्नके पिंड स्थूल देह में जन्म मृत्यु व्याधि यही दृढतासे विद्यमान है, अर्थात् निश्चयही इसकी दशा बदलती रहती है ॥६॥ ऐसे स्थूल देहमें प्राणोको अहंभावसे जो आत्मबुद्धि दृढ हो जाती है वह नही मिटती, आत्मा कभी जन्म नही लेता और इसका नाश भी नही होता कारण कि यह नित्यै है ॥७॥ अब शरीरकी अवस्था वर्णन करते इसकी निस्सारता प्रतिपादन करते है । उत्पत्ति (होना) अस्ति, परिपक्वता, वृद्धि, क्षय और नाश यह छः अवस्था इस शरीर की है ॥८॥ और घटमे स्थित आकाश जिस प्रकार निर्विकार है, इसी प्रकार इस देहमें आत्मा विकार रहित है, इस प्रकार देह और आत्मा इन दोनोंके धर्म परस्पर विरुद्ध हैं, अज्ञानी जन अविद्यासे देहको आत्मा मानते हैं, और ज्ञानी देहसे आत्मा को पृथक् देखते है ॥९॥ घड़ियामें गला करके डाले सुवर्णकी कान्तिके समान प्राणमय कोश है, यह स्थूल देह के अन्तर प्राणादि वायुसे बद्ध वर्तमान है, परन्तु पाय्वादि इन्द्रियोंसे युक्त चलनादि कर्मोंसे युक्त क्षुधापिपासासे व्याप्त और जड होने के कारण यह आत्मा नही है ॥१०॥११॥ आत्मा चैतन्यरूप है जिसके द्वारा यह जीव अपने शरीरको देखता है आत्माही परब्रह्म निर्लेप और सुखका सागर है ॥ १२॥ अज्ञान इस ब्रह्मका ग्रास नही कर सकता, न ब्रह्म किसी वस्तुका ग्रास करता है अर्थात् वह अनामय परिपुर्ण सर्वत्र सुखस्वरूप है, उसे कार्य कारण की अपेक्षा नही है, उस प्राणमय कोशके अन्तर्गत मनोमयकोश है, वह संकल्प विकल्परूप बुद्धि और इंद्रियोंसे समायुक्त है ॥१३॥ काम, क्रोध, लोभ, मोह मात्सर्य और मद यह शत्रुओंका षड्वर्ग और ममता इच्छादिक यह सम्पूर्ण मनोमयकोशके धर्म है ॥१४॥ जो कर्मविषयीणी बुद्धि और वेदशास्त्र से निश्चित की गई है, वह ज्ञान इन्द्रियोके सहित विज्ञानमय कोशमें स्थित रहती है ॥१५॥ इसमें कर्तृत्वपनका अभिमानी निःसन्देह वह जीव विद्यमान है । जो इस लोक तथा परलोकमें गमन करता है, व्यवहारमें जिसको जीव कहते है ॥१६॥ आकाशादिके सात्त्विक अंशसे ज्ञानेन्द्रियोंकी उत्पत्ति होता है, आकाशसे श्रोत्र, पृथ्वीसे घ्राण, जलसे जिह्वा, और तेजसे चक्षु और वायुसे त्वचा उत्पन्न होती है इस प्रकार यह इन्द्रिय पांचभौतिक है, जीवत्वप्राप्तिके तीन शरीर है, स्थूल, सूक्ष्म और कारण, स्थूल का अन्त सूक्ष्म और सूक्ष्मका अन्तः कारणशरीर है, सूक्ष्म शरीरकोही लिंग शरीर कहते है, इन तीनों शरीरोंमे पाँचकोश रहते हैं, अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय, स्थूल शरीरमें अन्नमय कोश है, सूक्ष्म शरीरमें आनंदमय कोश है, इन पांचो कोशोंमें अन्नमयकोशसे वर्णन करके लिंग शरीरके तीनों कोश कहकर लिंगशरीरके अवयवोंका वर्णन किया है ॥१७॥१८॥ इन पांचभूतोंके सात्विकादि अंशसे बुद्धि और मन उत्पन्न होते है, जिसमें बुद्धि निश्चयात्मिका और मन संशयात्मक है और वचन हाथ, पाद, पायु, उपस्थ यह पांच कर्मेन्द्रिय तो आकाशादिकोंकें रजोगुण अंशसे क्रमपूर्वक उत्पन्न होते है ॥१९॥ और उन सबके रजोगुण समान मिलनेसे पांच प्राणादि वायु उत्पन्न होते है, यही पांच ज्ञानेन्द्रिय, पांच कर्मेन्द्रिय, पांच प्राण, मन और बुद्धि मिलाकर सत्रह अवयवोंसे लिंग शरीरकी उत्पत्ति होती है ॥२०॥ यह लिंगशरीर तपाये हुए लोहखण्डकी समान गोल है, इस कारण परस्परके अध्यास पड़नेसे साक्षी चैतन्यसे युक्त है ॥ २१॥