भारतकोश
शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished44 पृष्ठ

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पृष्ठ 33

जहा साक्षी चैतन्य लिंग शरीरसे अध्यासको प्राप्त होता है, वही आनंदमयकोश है, उस आनंदमयकोशका जो कर्तृत्वपनका अभिमानी है, वही उपासना और कर्म फलसे इस लोक तथा परलोकमें कर्मफलका भोगनेवाला कहा जाता है ॥२२॥ और जिस समय निद्रावस्थामें यही आत्मा लिंगशरीरके अध्यासको छोड़कर केवल अपने स्वरूपमें अविद्यासंयुक्त रहता है, तब इसकी साक्षी संज्ञा है ॥२३॥ अन्तःकरणादि इन्द्रिय और इनकी वृत्ति अनुभव और स्मृति इनका द्रष्टा होनेसे अन्तःकरणका अध्यास होनेपर आत्माको साक्षित्व और केवल (अन्तःकरणके अध्यास नहीं ऐसा) हुआ तब भोक्तृत्व होता है ॥२४॥ इसके उपरान्त "ऋत पिबतौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः' इस श्रुतिको कहते है, आतप बिना आच्छादित बिंबरूप ईश्वर छाया- आच्छादित बिंबरूप जीव यह दोनो ब्रह्मए प्रकाशसे प्रकाशित है, इन दोनोंमें एकजीव भोक्ता होनेसे कर्मफलको भोक्ता है और ईश्वर द्रष्टा होनेसे भुगाता है ॥२५॥ क्षेत्रज्ञ जीवात्माको रथी, शरीरको रथ, बुद्धिको सारथी, मनको लगाम कहते है सो तू जाना ॥२६॥ इन्द्रियोको घोड़े स्वरूप जानना और यह इन्द्रियरूपी अश्व रूपादिविषयीरूपी स्थानमें विचरते है, इन्द्रिय और मनके सहित यह आत्मा भोक्ता कहाता है वास्तवमें उपाधि बिना यह आत्मा शुद्ध है कदाचित कर्तृत्व भोक्तृत्वको प्राप्त नही होता, तात्पर्य यही है कि रथी तो रथ में बैठा है, सारथी और घोड़े रथ को जिधर ले जाय उधर ही जाता है और यदि दुष्ट घोड़े हुए तो सारथी का भी कहना न मानकर रथ लेकर कही गढे में डाल देते है, इसी प्रकार दुष्ट इन्द्रिये इस शरीररूपी रथको विषयोंमें लेजाकर पटकती है, तब सब इन्द्रियोंके सहित आत्मा दुःखी प्रतीत होता है ॥२७॥ इस प्रकारसे जो ब्राह्मण शान्ति आदिसे युक्त होकर उपासना करता है वह जिस प्रकारसे कदलीके वल्कलको बराबर उतारते चले जाओ तो उसमें वल्कलही निकलते है पश्चात सार प्राप्त होता है, इसी प्रकार पंचकोशमें क्रम से उपासना करते और उनसे चित्त हटाते तथा उन्हे असाररूप जानते हुए सबके अन्तःसारभूत आत्मा को प्राप्त होता है ॥२८॥२९॥ इस प्रकार मन को सावधान करके पंचकोश का ज्ञान करके जो मन स्थिर करता है, तब उसका चित्त निराकार परमात्मामें लग जाता है ॥३०॥ तब यह मन केवल परमात्माको ही ग्रहण करता है जो केवल अदृश्य, अग्राह्य, स्थूल सूक्ष्मादि धर्म से परे है, उसमें प्राप्त होकर निश्चल हो जाता है, फिर चलायमान नही होता ॥३१॥ श्रीराम उवाच ॥ श्रीरामचन्द्र बोल-हे भगवन्! जब श्रवणादि साधनद्वारा आत्मस्वरूपकी प्राप्ति हो जाती है तो वेदशास्त्रके जाननेवाले यज्ञशील सत्यवादी उसके श्रवण करनेमें प्रवृत्त क्यों नही होते ॥३२॥ और कोई सुनकर भी आत्माको जान नही सकते, और कोई जानकर भी मिथ्या मानते है, क्या यह तुम्हारी माया है ॥३३॥ श्रीभगवानुवाच । श्रीशिवजी बोले, हे महाबाहो! यह ऐसेही है इसमें कुछ सन्देह नही, मेरी त्रिगुणात्मिका मायाका उल्लंघन करना महा कठिन है ॥३४॥ जो मेरी शरणागत आकर मुझको प्राप्त हो जाते है वे ही इस माया को तरते है, हे महाभुज! जो अभ्यभक्त है और जिनकी श्रद्धा मेरे विषय नहीं है ॥३५॥ वे इस लोक और परलोकमें अनेक प्रकारके फलकी इच्छा करनेवाले है उनको कर्मानुसार फल मिलता है वे सुख भोगकर भी थोड़े कालमें इस लोक में प्राप्त होते है, कारण कि, उन्हे तो कर्मफलही इष्ट है और कर्मफल क्षय होनेवाला है तथा थोडा और ऐसे लोकोंमें उन फलोंको भोगते है जहां जहां अल्पसुख है और शीघ्र नष्ट हो जाता है ॥३६॥ इस बातको न जानकर जो अधम मनुष्य कर्मों को करते है, वे माताके गर्भमें उत्पन्न होकर बारंबार मृत्यु मुखमें पडते है ॥३७॥ अनेक प्रकार की योनियोंमें उत्पन्न हुए किसी एक प्राणीकी करोडों जन्मके संचित किये पुण्यसे मेरे विषे भक्ति होती है ॥३८॥ वही श्रद्धायुक्त मेरा भक्त ज्ञान को प्राप्त होता है और दूसरा करोडों जन्मभी कर्म करनेसे मुझे प्राप्त नही होता ॥३९॥ इस कारण हे राम! और सब त्यागकर केवल मेरी भक्ति करो । दुसरे और सब धर्मोका त्यागन करके एक मेरी शरणमें हो मै तुमको सब पापोसे छुड़ाकर मुक्त कर दूँगा तुम सोच कुछ मंत करो ॥४०॥