शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)
Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 34, कुल 44 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे राम! तुम कुछ कर्म करते जो भोजन करते जो हवन करते और जो देते हो तथा जो तप करते हो वह सब मेरे अर्पण करो, हे राम ! इससे अधिक मेरेमें दृढ भक्ति होनेका दूसरा साधन नही है इसका तात्पर्य यह है कि शरीर इन्द्रिय और प्राण तथा मनके जो जो धर्म है उनका त्याग करके मुझको आश्रित हो अर्थात् मुझे प्राप्त हो ॥४१॥४२॥ इति श्रीपद्मपुराणे उपरिभागे शिवगीतासू० शिवराघवसंवादे पञ्चकोशोपपादनं नाम चतुर्दशोध्यायः ॥१४॥ अध्याय १५ श्रीरामचन्द्र बोले, हे भगवन! आपकी भक्ति कैसी है और वह किस प्रकार उत्पन्न होत है जिसके प्राप्त होनेसे यह जीव निर्वाण हो जाता है ओर मुक्तपदवी प्राप्त करता है, हे शंकर ! वह आप सब वर्णन कीजिये, जिससे संसारसे निवृत्ति प्राप्त हो ॥१॥ श्रीभगवानुवाच । शिवजी बोले जो वेदाध्ययन दान यज्ञ सम्पूर्ण मेरे में अपर्णकी बुद्धिसे करता है वह मेरा भक्त और मेरा प्रिय है वह इस प्रकार है कि "आम्ता त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं पूजाते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः । संचारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ॥१॥" अर्थ यह कि, यह शरीर शिवालय है, इसमें सच्चिदानन्द आप हो, बुद्धिरूप श्रीपार्वतीजी है, आपके साथ चलनेवाले नौकर प्राण है और जो मै विषयान्नन्दके निमित्त खाता पिता देखता सुनता हू बोलता स्पर्श करता हूं, यही आपकी पुजा है, निद्रा समाधि है, फिरना आपकी प्रदक्षिणा है, वचन आपकी स्तुति है, हे शिव! इस प्रकोर मै आपका आरोधन करता हूं, आप मेरे ऊपर कृपा करो इस प्रकार आराधन करे कर्मोको ऐसे मेरे अर्पण करे ॥२॥ अग्निहोत्रकी पवित्र भस्म लाकर अथवा श्रोत्रिय ब्राह्मणके स्थानसे लाकर "अग्निरिति" भस्म इत्यादि मन्त्रोंसे यथाविधि अभिमंत्रित कर ॥३॥ अपने शरीरमे उसे लगाकर और भस्मद्वाराही जो मेरा अर्चन करता है, हे राम! उससे अधिक मेरी भक्ति करनेवाला दूसरा नही है ॥४॥ जो प्राणी मस्तक और कण्ठमें रूद्राक्षको धारण करता है और (नमः शिवाय) इस पंचाक्षरी विद्याका जप करता है वह मेरा भक्त है और मुझे प्यारा है ॥५॥ भस्म लगानेवाला, भस्मपर शयन करनेवाला, सदा जितेन्द्रिय जो सदा रुद्रसूक्त जपता और अनन्य बुद्धिसे मेरा चिन्तन करता है ॥६॥ वह उसी देहसे शिवस्वरूप हो जाता है, जो रुद्रसूक्त वा अथर्वशीर्ष मन्त्रोका जप करता है ॥७॥ कैवल्योपनिषद् वा श्वेताश्वतर उपनिषद्का जो जप करता है उससे अधिक मेरा दूसरा भक्त इस लोकमें नही है ॥८॥ धर्मसे विलक्षण, अधर्मसे विलक्षण, कार्य और कारणसे भी परे भूत और भविष्यकालसे भी परे जिसको मै कहता हूं, सो तू सुन ॥९॥ जिस वस्तुको वेद और सब शास्त्र वर्णन करते है जो सम्पूर्ण उपनिषदोंमे से सारग्रहण किया है जैसे दहीमें से घृत ॥ १०॥ जिसकी इच्छा करके मुनिजन ब्रह्मचर्य धारण करते है, वह अकार उकार मकारात्मक हमारा पद है, सो मै तुझसे संक्षेपसे वर्णन करता हूँ ॥११॥ यही अक्षर परब्रह्म और सगुणब्रह्म, निर्गुणब्रह्म है, इसी अक्षर ब्रह्मके जाननेसे ब्रह्मलोकको प्राप्त होकर मुक्त हो जाता है ॥१२॥ यही उत्तम आधार हैयही उत्तम तारक है इसको जानके ब्रह्म लोकमें पूजित होता है ॥१३॥ जो वेदरूपी धेनुओंमें श्रेष्ठ है ऐसा वेदान्त प्रतिपादन करता है यही मोक्षका धारण करनेवाला और संसारसागर का सेतु है तथा च श्रुतिः "यश्छन्दसामृषभो विश्वरूपश्छन्दोभ्योऽध्यमृतात्संबभूव" इति नै० ॥१४॥ वह वस्तु क्या है अब उसका वर्णन करते है वह मेदसे आच्छादित हुए कोश अर्थात् हृदयाकाशमें जो ब्रह्म है उसे ओंकार