भारतकोश
शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished44 पृष्ठ

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कहते है । यही परम मंत्र है और इसीमें सब लोक निवास करते है, तथा च श्रुतिः "सोअयमात्माऽध्यक्षरमोंकारोधिमत्रं पादमात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकारः" इति माण्डू०। "ओमिति ब्रह्म । ओमितिदं सर्वम् ।" अर्थात् यह ओंकारही ब्रह्म और सब कुछ है ॥१५॥ उसकी चार मात्रा है अकार उकार और मकार और अन्तकी कारणरूप आधी मात्रा है पहली अकाररूप मात्रामें भूलोक ऋग्वेद, ब्रह्मदेव, आठ वसु, गार्हपत्य अग्नि, गायत्री छन्द और प्रातः सेवन यह आठ देव निवास करते है ॥१६॥ दूसरी उकार मात्रामें भुवर्लोक, विष्णु, रुद्र, अनुष्टुप् छन्द, यजुर्वेद, यमुनानदी, दक्षिणाग्नि, माध्यंदिन सवन यह दैवता निवास करते हैं ॥१७॥ तीसरी प्रकार मात्रा मे स्वर्लोक, सामवेद, आदित्य, महेश्वर, आहवनीयग्नि, जगती छन्द और सरस्वती नदी ॥१८॥ और अथर्ववेद तृतीयसवन यह वास करते है और जो चौथी मात्रा है वह सोमलोक ॥१९॥ अथर्वांगिरस गाथा संवर्तक अग्नि महर्लोक, विराट्, सभ्य और आवसथ्य अग्नि, शतद्रौनदी और यज्ञपुच्छ यह देवता निवास करते है "अमात्रश्चतुर्थो व्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोङ्कार आँत्मैव संविशत्यात्मनोऽात्मान् य एवं वेद य एवं वेद" अर्थात् जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तीन अवस्थासे परे अमात्रिक तुरीया अवस्थारूप आत्मा ही है, यह वाचकवाच्यरूप वाणी मनका मूल अज्ञान दूर करनेसे व्यवहारके अयोग्य है, तथा प्रपंचरहित शिवस्वरूप और अद्वैत है । यह उच्चारण किया हुआ ॐकार आत्मा ही है ऐसे जो जानता है वह अपने आत्मासे परमार्थरूप आत्मामें प्रवेश करता है, और जन्मके कारणोंका लय कर फिर उत्पन्न नही होता ॥२०॥ पहली मात्रा रक्तवर्ण, दूसरी भास्वर (प्रकाशयुक्त) वर्ण, तीसरी बिजलीके वर्णकी तथा चौथी मात्र शुभ वर्ण है ॥२१॥ जो कुछ उत्पन्न हुआ है और जो कुछ उत्पन्न होगा स्थावर जंगमात्मक अनेक प्रकारका यह जगत ॐकारमें ही प्रतिष्ठित है ॥२२॥ भूत भविष्यरूप यह संसार रुद्ररूप ही है और रुद्रमें प्राण और उसमें भी ॐकार स्थित है, तात्पर्य यह है शिव और ॐकार एकस्वरूप है ॥२३॥ वह शिवरूप सनातन ब्रह्म ॐकारने ही वर्तमान है इस कारण ॐकारका जपनेहारा निःसन्देह मुक्त हो जाता है ॥२४॥ श्रौत अग्निसे अथवा स्मार्त अग्निसे अथवा शैवाग्निसे उत्पन्न हुई भस्मको जो ॐकार से अभिमंत्रित करके ॐकारद्वारा जो मेरा पूजन करता है, उससे अधिक संसारमें मेरा दूसरा प्रियभक्त नही है ॥२५॥ घरकी अग्नि अथवा वनकी अग्निकी भस्मको ॐकार से अभिमंत्रित करके जो अपने शरीरमें लगावे वह शुद्धभी मुक्तिको प्राप्त हो जाता है ॥२६॥ दर्भांकुर, बिल्वपत्र तथा और भी वनके पर्वतके उत्पन्न हुए फूलोंसे ॐकार द्वारा जो मेरी नित्य पूजा करता है वह मेरा प्रिय है ॥२७॥ पुष्प, फल, मूल, पत्र किंवा जलसे जो ओंकारयुक्त मेरे निमित्त दान करता है, वह करोड गुना हो जाता है ॥२८॥ किसी प्राणिमात्रकि हिंसा न करनी, सत्य बोलना, चोरी न करनी, बाह्याभ्यंतर शौचयुक्त, इन्द्रियनिग्रह करनेवाले, वेदाध्ययनमें तत्पर जो मेरे भक्त है वे मेरे प्यारे है ॥२९॥ जो कोई प्रदोषके समय मेरे स्थानमें जाकर मेरी पूजा करता है, वह अत्यन्त लक्ष्मीको प्राप्त होता है, और अन्तमें मुझमें लय होजाता है ॥३०॥ अष्टमी, चतुर्दशी, पूर्णिमा, अमावास्या इन तिथियोंमें जो सर्वांगमें भस्म लगाकर रात्रिके समय मेरा पूजन करता है वह मेरा भक्त और प्रिय है ॥३१॥ जो एकादशीके दिन व्रत रहकर प्रदोषके समय मेरा पूजन करता है और विशेष करके जो सोमवारके दिन मेरी पूजन करता है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है ॥३२॥ जो पंचामृत, पंचगव्य, पुष्प, सुगन्धयुक्त जल अथवा कुशके जलसे मुझे स्नान कराता है उससे अधिक मेरा कोई प्रिय नही है ॥३३॥ दूध, घृत, मधु, इक्षुरस (गन्नेका रस) पक्के आमके फल अथवा नारियलके जलसे ॥३४॥ अथवा जो गंधयुक्त जलसे रुद्रमंत्र उच्चारण करता हुआ मेरा अभिषेक करता है उससे अधिक प्यारा दूसरा मुझे नही है ॥३५॥ और जो जलमे स्थित हो सूर्यकी ओर मुख किये ऊपरको बाहें उठाये सूर्यके बिंबमें मेरा ध्यान करता हुआ अथर्वांगिरसका जप करता है वह इस प्रकार मेरे शरीरमें प्रवेश करता है, जैसे गृहपति घरमें प्रवेश करता है और बृहद्रथन्तर वामदेव

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