शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)
Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयह स्थावर जंगमात्मक संसार मुझसेही उत्पन्न हुआ है, सब प्राणि मेरे ही निवास स्थान है, ऐसा वेदके जाननेवाले कहते है ॥७॥ एक प्रधान और एक पुरुष यह जो दो वर्णन किये है उन दोनोंका संयोग करनेवाला अनादि काल है यह तीनों अनादि है और अव्यक्तमें निवास करते है इनका वो तदात्मक रूप है वही साक्षात मेरा स्वरूप है ॥८॥९॥ जो महतसे लेकर यह सम्पूर्ण जगत उत्पन्न करती है वह संपूर्ण देहधारियोंकी मोहित करनेवाली प्रकृति कहलाती है ॥ १०॥ यह पुरुषही प्रकृतिमें स्थित होकर प्रकृतिके गुणोंको भोगता है, अहंकारसहित होनेसे पच्चीसतत्तवनिर्मित यह देह कहाता है ॥११॥ प्रकृतिका प्रथम विकारही महान कहाता है यह आत्मा विज्ञानशक्तियुक्त स्थित रहता है पीछे उसीसे विज्ञानशक्तिका जाननेहारा अहंकार उत्पन्न होता है ॥१२॥ उस एकही महान आत्माका नाम अहंकार कहा जाता है वही जीव और अंतरात्मा कहा जाता है, यह तत्त्वके जाननेवालोंने कहा है ॥१३॥ यही जन्म लेकर, सुख और दुःख भोगता है यद्यपि वह विज्ञानात्मा है परन्तु मनके संग होनेसे वह मन उसके उपकारक है ॥१४॥ अज्ञानके कारण इस पुरुषको संसारकि प्राप्ति हुई है और प्रकृतिसे पुरुषका संयोग होनेसे कालान्तरमें पुरुषको अज्ञानकी प्राप्ति हुई है ॥१५॥ यह कालही जीवों को उत्पन्न करता और कालही संहार करता है, सम्पूर्ण ही कालके वशमें है, परन्तु काल किसीके वशमे नही है ॥१६॥ वही सनातन सबके हृदयमे स्थित होकर इस सबको जानता है और वशमें रखकर शासन करता है, उसेही भगवान प्राणस्वरूप सर्वज्ञ पुरुषोत्तम कहते है ॥१७॥ मनीषी विद्वानोंने इन्द्रियोंसे परे मनको कहा है, मनसे परे अहंकार, अहंकारसे परे महत् है ॥१८॥ महानसे परे अव्यक्त और अव्यक्तसे परे पुरुष है, पुरुषसे परे भगवान प्राण स्वरूप है, उससे यह सब जगत हुआ है ॥ १९॥ प्राणसे परे व्योम (आकाश) और व्योमसे परे अग्नि ईश्वर है, सो मै सबसे व्याप्त शान्तस्वरूप हूं और मुझसे यह सब जगत विस्तृत हुआ है ॥२०॥ मुझसे परे और कुछ नही है प्राणी मुझको जानकर मुक्त हो जाता है संसारमे स्थावर जंगम इनमें किसीको भी नित्यता नही है ॥२१॥ केवल एक मै ही व्योमरूप महेश्वर हू सो मै ही सब जगतको उत्पन्न करके संहार करता हूं ॥२२॥ मायास्वरूप मुझमें कालकी संगति होकर मेरी स्थितिसे ही काल सम्पूर्ण जगतके उत्पन्न करनेमे समर्थ हुआ है कारण (कलनात् सर्व्वभूतानां कालः स परिकीर्तितः) सम्पूर्ण प्राणियोंकी आयुकी संख्या करनेसे ही इसका नाम काल हुआ है ॥ २३॥ यही अनन्तात्मा सब जगतको यथायोग्य रखता है, यही वेदका अनुशासन है, किसीको महादेव कालात्मा कालान्त आदिनामसे उच्चारण करते है, यही दैत्योंको संहार करते है इस प्रकार जानना उचित है ॥२४॥ सूतजी बोले - हे ब्रह्मवादी ऋषियो! तुम सावधान होकर सुनो हम उन देवदेव आदि पुरुषका माहात्म्य कहते है जिनसे यह सम्पूर्ण जगत् प्रवृत्त हुआ है ॥२५॥ शिवजी बोले- अनेक प्रकारके तप ज्ञान दान और यज्ञसे पुरुष मुझे इस प्रकार नही जान सकते जिस प्रकार श्रेष्ठ भक्ति करनेवाले मुझको जाननेको समर्थ होते है इससे केवल श्रेष्ठ भक्ति करनेवाले मुझे शीघ्र जान सकते है ॥२६॥ मै ही सर्वव्यापी होकर सब प्राणियोके अन्तःकरणमे स्थित हूं, हे मुनीश्वरो! मुझे यह संसार सब लोकोंका साक्षी नही जानता है ॥२७॥ जो यह परमात्मा सबके हृदयान्तरमे निवास करता है, उसीके अन्तरमें यह सब जगत है वही धाता विधाता कालाग्निस্বরূপ सर्वव्यापक परमात्मा मै हू ॥२८॥ मुझको मुनि और सब देवता भी नही जानते है तथा ब्रह्मा इन्द्र मनु औरभी विख्यात पराक्रमी मेरे रूपको यथार्थ जाननेमें समर्थ नही होते ॥२९॥