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शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished44 पृष्ठ

यह स्थावर जंगमात्मक संसार मुझसेही उत्पन्न हुआ है, सब प्राणि मेरे ही निवास स्थान है, ऐसा वेदके जाननेवाले कहते है ॥७॥ एक प्रधान और एक पुरुष यह जो दो वर्णन किये है उन दोनोंका संयोग करनेवाला अनादि काल है यह तीनों अनादि है और अव्यक्तमें निवास करते है इनका वो तदात्मक रूप है वही साक्षात मेरा स्वरूप है ॥८॥९॥ जो महतसे लेकर यह सम्पूर्ण जगत उत्पन्न करती है वह संपूर्ण देहधारियोंकी मोहित करनेवाली प्रकृति कहलाती है ॥ १०॥ यह पुरुषही प्रकृतिमें स्थित होकर प्रकृतिके गुणोंको भोगता है, अहंकारसहित होनेसे पच्चीसतत्तवनिर्मित यह देह कहाता है ॥११॥ प्रकृतिका प्रथम विकारही महान कहाता है यह आत्मा विज्ञानशक्तियुक्त स्थित रहता है पीछे उसीसे विज्ञानशक्तिका जाननेहारा अहंकार उत्पन्न होता है ॥१२॥ उस एकही महान आत्माका नाम अहंकार कहा जाता है वही जीव और अंतरात्मा कहा जाता है, यह तत्त्वके जाननेवालोंने कहा है ॥१३॥ यही जन्म लेकर, सुख और दुःख भोगता है यद्यपि वह विज्ञानात्मा है परन्तु मनके संग होनेसे वह मन उसके उपकारक है ॥१४॥ अज्ञानके कारण इस पुरुषको संसारकि प्राप्ति हुई है और प्रकृतिसे पुरुषका संयोग होनेसे कालान्तरमें पुरुषको अज्ञानकी प्राप्ति हुई है ॥१५॥ यह कालही जीवों को उत्पन्न करता और कालही संहार करता है, सम्पूर्ण ही कालके वशमें है, परन्तु काल किसीके वशमे नही है ॥१६॥ वही सनातन सबके हृदयमे स्थित होकर इस सबको जानता है और वशमें रखकर शासन करता है, उसेही भगवान प्राणस्वरूप सर्वज्ञ पुरुषोत्तम कहते है ॥१७॥ मनीषी विद्वानोंने इन्द्रियोंसे परे मनको कहा है, मनसे परे अहंकार, अहंकारसे परे महत् है ॥१८॥ महानसे परे अव्यक्त और अव्यक्तसे परे पुरुष है, पुरुषसे परे भगवान प्राण स्वरूप है, उससे यह सब जगत हुआ है ॥ १९॥ प्राणसे परे व्योम (आकाश) और व्योमसे परे अग्नि ईश्वर है, सो मै सबसे व्याप्त शान्तस्वरूप हूं और मुझसे यह सब जगत विस्तृत हुआ है ॥२०॥ मुझसे परे और कुछ नही है प्राणी मुझको जानकर मुक्त हो जाता है संसारमे स्थावर जंगम इनमें किसीको भी नित्यता नही है ॥२१॥ केवल एक मै ही व्योमरूप महेश्वर हू सो मै ही सब जगतको उत्पन्न करके संहार करता हूं ॥२२॥ मायास्वरूप मुझमें कालकी संगति होकर मेरी स्थितिसे ही काल सम्पूर्ण जगतके उत्पन्न करनेमे समर्थ हुआ है कारण (कलनात् सर्व्वभूतानां कालः स परिकीर्तितः) सम्पूर्ण प्राणियोंकी आयुकी संख्या करनेसे ही इसका नाम काल हुआ है ॥ २३॥ यही अनन्तात्मा सब जगतको यथायोग्य रखता है, यही वेदका अनुशासन है, किसीको महादेव कालात्मा कालान्त आदिनामसे उच्चारण करते है, यही दैत्योंको संहार करते है इस प्रकार जानना उचित है ॥२४॥ सूतजी बोले - हे ब्रह्मवादी ऋषियो! तुम सावधान होकर सुनो हम उन देवदेव आदि पुरुषका माहात्म्य कहते है जिनसे यह सम्पूर्ण जगत् प्रवृत्त हुआ है ॥२५॥ शिवजी बोले- अनेक प्रकारके तप ज्ञान दान और यज्ञसे पुरुष मुझे इस प्रकार नही जान सकते जिस प्रकार श्रेष्ठ भक्ति करनेवाले मुझको जाननेको समर्थ होते है इससे केवल श्रेष्ठ भक्ति करनेवाले मुझे शीघ्र जान सकते है ॥२६॥ मै ही सर्वव्यापी होकर सब प्राणियोके अन्तःकरणमे स्थित हूं, हे मुनीश्वरो! मुझे यह संसार सब लोकोंका साक्षी नही जानता है ॥२७॥ जो यह परमात्मा सबके हृदयान्तरमे निवास करता है, उसीके अन्तरमें यह सब जगत है वही धाता विधाता कालाग्निस্বরূপ सर्वव्यापक परमात्मा मै हू ॥२८॥ मुझको मुनि और सब देवता भी नही जानते है तथा ब्रह्मा इन्द्र मनु औरभी विख्यात पराक्रमी मेरे रूपको यथार्थ जाननेमें समर्थ नही होते ॥२९॥

मुझही एक परमेश्वरको सदा वेद स्तुति करते रहते है, (सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति) और ब्राह्मणादि अनेक प्रकारके छोटे बडे यज्ञोद्वारा यजन करते रहते है ॥३०॥ पितामह ब्रह्मासहित सम्पूर्ण लोक नमस्कार करते है, और योगी जन सम्पूर्ण भूतोंके अधिपति भगवानका ध्यान करते है ॥३१॥ मै ही सम्पूर्ण हवियोंको भोक्ता और फल देनेवाला हूं, मै ही सबका शरीररूप होकर सबका आत्मा सबमे स्थित हू ॥ ३२॥ मुझे विद्वान् धर्मात्मा और वेदवादी देख सकते है उनके निकट जो नित्यप्रति मेरी उपासना करते है ॥३३॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, धार्मिक मेरे उपासना करते है उनको मै परमानन्द परमपद स्वरूप अपने स्थानको देता हूं ॥ ३४॥ और जो शूद्र आदि नीच जाति अपने धर्ममें स्थित है और वह मेरे भक्ति करते है वे कालसे यद्यपि मिले हुए है तथापि मेरी कृपादृष्टिसे मुक्त हो जाते है ॥३५॥ मेरे भक्त पापरहित हो जाते है उनका कभी नाश नही होता प्रथम तो यही मेरीप्रतिज्ञा है कि मेरे भक्तोंका कभी नाश नही होता यदि वह बीचमे ही सिद्धि प्राप्त होनेसे पूर्व मृत्तक हो जाय तो फिर योगीके घरमे जन्म ले सत्संगको प्राप्त हो मुक्त हो जाता है ॥३६॥ जो मुर्ख मेरे भक्तोंकी निन्दा करता है उसने देवदेव साक्षात मेरीही निन्दा की और प्रेमसे उनका पूजन करता है उसने मानां मेराही पूजन किया ॥३७॥ परिपुर्ण शिवस्वरूपमें और क्या शुभ किया जाय, जो कुछ शिवके भक्तके निमित्त किया है, वह सब कुछ मुझ शिवस्वरूपके ही वास्ते किया है ॥३८॥ जो प्रेमसे मेरे आराधनके कारण पत्र पुष्प फल जल नियमित होकर प्रदान करता है वह मेरा भक्त और मेरा प्यारा है ॥ ३९॥ मै ही जगतकी आदिमे सृष्टि उत्पन्न करनेसे ब्रह्मा परमेष्ठी कहा जाता है, तथा पालन करनेसे उत्तम पुरुष परमात्मा इस नामसे गाया जाता हैं ॥४०॥ मै ही सम्पूर्ण योगियोंका अविनाशी गुरु हू, मै हि धर्मात्माओंका रक्षक और वेदविरोधियोंका नाश करनेवाला हू ॥४१॥ मै ही योगियोंको संसारबन्धनके सब प्रकारके क्लेशसे छुडानेवाला हू, मैही सब प्रकार संसारसे रहित होकर संसारका कारणभी हू ॥४२॥ मै ही सब संसारको उत्पन्न पालन करनेहारा तथा संहार करता ह कारण कि, कार्य अपने कारणमे लय हो जाता है, इससे सब जगत मुझसे उत्पन्न होकर मुझमेही लय होजाता है तथा च श्रुतिः (विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता) और यह मेरी महाशक्ति लोकोको मोहनेवाली माया है जो अनेक प्रकारसे जगतको उत्पन्न करती है (अजामेका लोहितशुक्लकृष्णा बह्वीः मजाः सृजमानाम सरूपाः) इति श्रुतेः ॥४३॥ और मेरीही यह परा शक्ति विद्या नामसे गाई जाती है मै योगियोंके हृदयमे स्थित होकर उस अज्ञानकी उत्पन्न करनेवाली संसारमे भ्रमानेवाली मायाको नाश करता हूँ ॥४४॥ मैही सम्पूर्ण शक्तियोंके प्रेरणा करनेवाला ह, और मै ही निवृत्त करनेवाला ह, मैही अमृतका निधान हू ( स दाधार पृथ्बी द्यामुतेभामिति श्रुतेः) श्रुतिसे भी यह सिद्ध है कि, यह विश्वको धारण कर रहा है ॥४५॥ मैही सम्पूर्ण जगत हं और मुझमें ही सब जगत है अर्थात यह सब कुछ मै ही ह दूसरी वस्तु कुछ नही है (सर्व खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचनेति श्रुतेः) यह सब जगत मुझसे ही उत्पन्न होकर मुझमे ही लय हों जाता है (यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च) जैसे मकडी अपनेमेसे जाला निकालकर ग्रहण कर लेती है इसी प्रकार मै जगत उत्पन्न कर फिर लय करलेता हू ॥४६॥ मै ही भगवान ईश्वर स्वयंज्योति सनातन हू, मै ही परमात्मा परब्रह्म हू, मुझसे परे कोई दुसरा नही है ॥४७॥ यह एक शक्ति जो सबके अन्तःकरणमें स्थित होकर अनेक प्रकारके जगतको उत्पन्न करती है यही मेरी शक्ति मुझ ब्रह्मस्वरूपमें स्थित होकर जगतकी रचना करती है और मुझही में स्थित है ॥४८॥ दूसरी शक्ति नारायण देव जगन्नाथ जगन्मय विष्णुस्वरूप होकर इस संपूर्ण जगतको स्थापित करती अर्थात पालती है ॥४९॥ तीसरी महती शक्ति है जो सम्पूर्ण जगतका संहार करती है उस शक्तिका नाम तामसी है तथा उसका रौद्ररूप है

कालनाम है ॥५०॥ कोई मुझे ज्ञानसे देखते है, कोई ध्यानसे, कोई भक्तियोग और कोई कर्मयोगसे अर्थात कर्मकाण्डके आश्रयसे मेरा यजन करते है ॥५१॥ परन्तु इन सब भक्तोंमे वह मुझे सबसे अधिक प्यारा जो नित्य प्रतिज्ञासे मेरी आराधना करता है ॥५२॥ और भी जो मेरे भक्त मेरी उपासना करते है, वे भी मुझको प्राप्त होजाते है, और फिर उनका जन्म नही होता (यथा इह स्थातुमपेक्षते तस्मै सर्वैश्वर्यं ददाति यत्र कुत्रापि म्रियते देहान्ते देवः परं ब्रह्मं तारकं व्याचष्टे येनामृतीभूत्वा सोऽमृतत्वं च गच्छति) अर्थात् जो उसकी भक्ति करता है और उन्नतिको प्राप्त होनेकी इच्छा करता है, उसे भगवान सम्पूर्ण ऐश्वर्य देते है और वह ही मृतक हो देहान्तमें भगवान उसे तारक मंत्रका उपदेश करते है, जिससे उसका फिर जन्म नही होता ॥५३॥ मैने ही सम्पूर्ण प्रधान और पुरुषात्मक जगत उत्पन्न किया है मुझही मे यह सम्पूर्ण जगत स्थित है और मुझसे ही प्रेरित होता है ॥५४॥ मै इसका प्रेरक नही ह, अर्थात उपाधिसे प्रेरण करनेवाला ह ऐसा विद्वान जानते है परन्तु वास्तवमें मे प्रेरक नही, हे परमयोग साधनेवाले ब्राह्मणो! जिस प्रकारसे मै प्रेरक नही है और जिस प्रकारसे प्रेरक हू इसको जो जानते है वह मुक्त स्वरूप है अर्थात् तत्वविचारसे जानना उचित है कि, वास्तवमै ब्रह्म कुछ नही करता ॥५५॥ मै इस संसारको जो स्वभावसे वर्तमान है सब ओरसे देखता हूं परन्तु महायोगेश्वर काल भगवान काल यह सब कुछ स्वयं करता है ॥५६॥ पंडित जन मेरे शास्त्रके अनुष्ठान करनेवालोंको योगी कहते है और यह भगवान महादेव महाप्रभु योगेश्वर कहलाते ॥५७॥ यह भगवान् महादेव महेश्वर की सम्पूर्ण प्राणियोंसे अधिक होनेसे और परेसे परे होनेसे परमेष्ठी ब्रह्मा कहलाते है अर्थात गुण कर्मोंके अनुसार अनेक नाम है इनके यथार्थ जाननेसे परम पदकी प्राप्ति होती है ॥५८॥ जो इस प्रकार मुझको महायोगियोंके ईश्वर जानते है वह विकल्परहित योगको प्राप्त होता है इसमें कुछ संदेह नही ॥ ५९॥ मैही परमानन्द स्वरूप मे स्थित होकर सबका प्रेरक देव ह मै ही सबमे नृत्य करता ह अर्थात कर्मानुसार सब भूतोंका भ्रमण कराता हु जो इस बातको जानता है वही वेदका जाननेवाला होता हैं इस प्रकार तत्त्वज्ञानसे मुझे जानकर परम पदको प्राप्त होजाता है ॥६०॥ ॐ तत्सदिति श्रीपद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु शिवराघवसंवादे ब्रह्मनिरूपणं नाम सप्तदशोध्यायः ॥१७॥



अध्याय १८ श्रीराम उवाच । श्रीरामचन्द्रबोले - हे देवदेव! हे सृष्टिसंहारकर्ता! हे नाथ! कृपा करके मुझसे मुक्तिके साधन कहिये ॥१॥ श्रीभगवान बोले - हे बुद्धिमान रामचंद्र ! मन लगाकर सुनो, यह महाआनंददायक वार्ता मै तुम्हारे प्रति वर्णन करता हूँ ॥२॥ उस सर्वज्ञ सर्वस्वरूप सर्वेशका आश्रय करके जो कि सबका लक्षणस्वरूप है भाव और अभावसे हीन उदय और अस्तसे वर्जित ॥३॥ स्वभावसे ही प्रकाशस्वरूप शान्तस्वरूप है जिस अव्ययको कोई देखनेको समर्थ नही, आलम्बरहित परम सूक्ष्म सबके आधारभूत परेसे परे है ॥४॥ वह ध्यान ध्येय संपन्न नही है, न लक्ष्य है, न भावना, न अवद्धकरण, न अभ्यासके चलायमान करनेसे ॥५॥ न इडा पिंगला, न सुषुम्ना नाडीद्वारा उसका आना जाना, न अनाहत, न कण्ठमें, न नादमें, न बिंदुमें ॥६॥ न हृदय, न शिर, न नेत्रोंके बन्द करने, न ललाटमध्यमें, न नासाके अग्र भागमें, न प्रवेश होनेमें, न निकलनेमें ॥ ७॥

न बिंदुमालिनी, न हंस, न आकाश, न तारका, न निरोध, न ज्ञान, न मुद्रा, न आसन ॥८॥ न रेचक, न पूरक, न कुम्भक, न संपुट, न चिंता, न शून्य, न स्थान, न कल्पना ॥९॥ न जाग्रत, न स्वप्न, न सुषुप्ति, न तुरीय, न सालोक्य, न सामीप्य, न सरूप, न सायुज्य ॥१०॥ न बिंदुके भेदमें ग्रथित होना, न नासिका का अग्रभाग देखना, न ज्योति, न शिखान्त, न कुछ प्राणधारणमें ॥११॥ न ऊर्ध्व, न आदि, न मध्यमें, न आदि मध्य और अन्त, न दूर, न धोरे, न प्रत्यक्ष, न परोक्ष (दृष्टि अगोचर) ॥१२॥ न ह्रस्व, न दीर्घ, न लुप्त, न अक्षर, न त्रिकोण, न चतुष्कोण, न दीर्घ, न गोल, न ह्रस्व और दीर्घविहीन सुषुम्नासे भी जानने, अैंयोग्य ॥१३॥ न ध्यान, न शास्त्र, न आयत (दीर्घ), न पुष्टक (पोषण कारक), न वाम, न दक्षिण, न आच्छादित, न मध्यमें, न स्त्री न पुरुष, न षण्ढ, न नपुसंक ॥१४॥१५॥ न आचार सहित, न आचार रहित, न तर्क, न तर्क का कारण, लय, विलय, अस्ति, नास्तिक रहित ॥१६॥ न उसके माता, न पिता, न भाई, न मातुल (मामा), न पुत्र,, न स्त्री, न पोता, न पुत्री है ॥१७॥ उसके निमित्त न दुष्ट मायाका कर्तव्य है, न स्थानबन्ध, इसी प्रकार ग्रामबन्ध घरका बंधन तथा आत्माका बन्धन ॥ १८॥ न जातिबन्धक करनेकी आवश्यकता, न वर्णबन्धन, न उसका विपर्यय (उलटा), न व्रत, न तीर्थ, न उपासना, न क्रिया ॥१९॥ न अनुमानके करनेकी आवश्यकता, न क्षेत्रबंध, न सेवा, न शीत, न उष्ण, न कुछ प्राणधारणा ॥२०॥ जो अनेक पक्षोंसे रहित हेतु और दृष्टान्त से वर्जित, बाह्य अन्तर एकाकर, परेसे परे तथा उससे भी परे देव विश्वके आत्मा सदाशिव है ॥२१॥ जो अनन्त, सूर्यकी समान प्रकाशमान, जो अनन्त चन्द्रमाकी समान कान्तिमान, अनन्त, गणेशकी समान शोभायमान, अैनन्त विष्णुकी समान दैत्योंके मारनेवाले, अनन्त दावाग्निकी समान जाज्वल्यमान, अनन्त रूप रुद्र की समान उग्ररूपधारी ॥२२॥२३॥ अनन्त समुद्रकी समान गंभीर, अनन्त वायुकी समान महाबली, अनन्त आकाशकी समान विस्तारवान, अनन्त यमराजकी समान भयानक, अनन्त सुमेरुकी समान विस्तृत, अनन्त कुबेरकी समान ऋद्धिदायक, निष्कलंक, निराधार, निर्गुण, गुणवर्जित है ॥२४॥२५॥ न काम, न क्रोध, न पिशुनता, न पाखण्डता, न माया, न मोह, न लोभ, न शोक ॥२६॥ इनके द्वारा तथा लोभके द्वारा परमात्मा प्राप्त नही होता, शनैः शनैः लोभादिको त्यागन करदे, साधन सिद्धि औषधी फल ॥२७॥ इस रसायन धातुवाद वितण्डा) अञ्जन (जिसके लगानेसे त्रिलोकीका ज्ञान हो) खड्गसिद्धि पाताल तथा आकाश गमनसिद्धि रस तथा मूल इनमें किसी प्रकार मन न लगाना चाहिये किन्तु यह सब प्रकारकी सिद्धिये तृणका समान सब त्यागना चाहिये स्वयं प्राप्त हुई हो ॥२८॥२९॥ आठों महासिद्धि और अणिमादिक सिद्धिये इनके संयोगके तृणवत त्यागनेस मुक्त हो जाता है इसमें कोई सन्देह नही ॥ ३०॥ किये हुए कर्मोके फलमे इच्छा न करनी तथा उनका त्याग करना संगरहित होना इस प्रकार शून्य अशून्यमें होकर कुछभी न विचारे ॥३१॥ न कुछ चिन्तन करे न कल्पना करे, न मनन करे, कारण कि वह मनके भी परे है मनके नष्ट होनेसे चिन्ता और इन्द्रियादि लय हो जाती है ॥३२॥ सम्पूर्ण चिन्ताको त्यागन करके चित्तको अचिन्ताके आश्रय करे बहुत कहनेसे क्या है हृदयमें विचार प्रवेश करके और उसे अनवस्थाकर अर्थात् लय करके फिर कुछभी न विचारे, अनित्य कर्मका त्यागनेवाला अथवा नित्य अनुष्ठानमें तत्पर ॥३३॥३४॥ सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तमें निवास करनेहारे वाणी मन और बुद्धिसे मोहनेहारे अनेक प्रकारके यह सब कर्म जो कुछ भी है

सब ब्रह्मरुपही है, फिर विषयादिक मे कौनसी वस्तु त्यागनेके योग्य है, कारण कि (ईशावास्यमिदं सर्व यत्किंचज्जगत्यां जगदिति श्रुतिः ) यह सब कुछ ब्रह्मही है ॥३५॥ इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखण्डे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे पण्डितज्वालाप्रसादमिश्रकृत भाषाटीकायां जीवन्मुक्तिस्वरूपनिरूपणयोगो नामाष्टादशोऽध्यायः ॥१८॥ फाल्गुनकृष्ण त्रयोदशी, शशिदिन शंभु मनाये ॥ शिवगीताको तिलक यह, पूर्ण कियो मन लाय ॥१॥ उन्निससै पंचाश शुभ, सम्वत्सर सुखदान ॥ चंद्रमौलि शंकरसुमिर, भाष्यो गीताज्ञान ॥२॥ पढहिं सुनहिं आचरहिं जो, पावहिं पदनिर्वान ॥ भक्तिलहहिं शिवकी शुभद, नितनूतन कल्यान ॥३॥ हे शंकर यह आपके, अर्पण कियो बनाय ॥ करिये अंगीकार प्रभु, पुष्पांजलि गिरिशाय ॥४॥ नित ज्वालाप्रसाद पद, वन्दत वारंवार ॥ यह प्रसाद है आपको, करिये प्रभु निस्तार ॥५॥ ॥श्रीसांबसदाशिवार्पणमस्तु॥