शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (गन्धर्वराज पुष्पदन्त - सानुवाद सटीक)
Shiva Mahimna Stotram with Hindi Commentary
गन्धर्वराज पुष्पदन्त / आचार्य राजेश दीक्षित द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ शिवमहिम्नस्तोत्रम् स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो विकारोऽपिश्लाघ्यो भुवनभयभंगव्यसनिनः ।१४। हे त्रिनयन ! सिन्धु विमंथन से उत्पन्न कालकूट से असमय में ब्रह्माण्ड के नाश से डरे हुए सुर व असुरों पर कृपा करके एवं संसार को बचाने की इच्छा से उसको (काल कूट को) पान करने से आपके कण्ठ की कालिमा भी शोभा देती है। ठीक ही है, जगत् के उपकार की कामना वाले दूषण भूषण समझे जाते हैं ॥ १४ ॥ असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे । निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः ॥ स पश्यन्तीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत् । स्मरःस्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः।१५। जो विजयी कामदेव अपने बाणों द्वारा जगत् के देव, मनुष्य और राक्षसों को जीतने में सर्वथा समर्थ रहा, उसी कामदेव अन्य देवों के समान आपको भी समझा, जिससे वह स्मरण मात्र के लिये ही रह गया (दग्ध हो गया), जितेन्द्रियों का अनादर करना अहितकारक ही होता है ॥ १५ ॥ मही पादाघाताद्व्रजति सहसा संशयपदम् । पदं विष्णोर्भ्राम्यद्भुजपरिघरुग्णग्रहगणम् ॥