भारतकोश
शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (गन्धर्वराज पुष्पदन्त - सानुवाद सटीक)

शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (गन्धर्वराज पुष्पदन्त - सानुवाद सटीक)

Shiva Mahimna Stotram with Hindi Commentary

गन्धर्वराज पुष्पदन्त / आचार्य राजेश दीक्षित द्वारा

DevanagariSanskritpublished35 पृष्ठ

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भाषा-टीका-सहितम् ७ अमुष्य त्वत्सेवा समधिगतसारं भुजवनम् । बलात्कैलासेऽपि त्वदधिवसतौविक्रमयतः ॥ अलभ्या पातालेऽप्यलसचलितांगुष्ठशिरसि । प्रतिष्ठा त्वय्यासीद् ध्रुवमुपचितोमुह्यति खलः ॥१२॥ रावण द्वारा उन्हीं भुजाओं से जिन्होंने आपकी सेवा से बल प्राप्त किया था, आपके घर कैलास को उखाड़ने के लिए हठात् प्रयोग करते ही आपके अँगूठे के अग्र भाग के संकेत मात्र पाताल में गिरा, निश्चय ही खल उपकार भूल जाते हैं ॥ १२ ॥ यदृद्धि सुत्राम्णो वरद ! परमोच्चैरपि सती- । मधश्चक्रे बाणः परिजनविधेयस्त्रिभुवनः ॥ नतच्चित्रं तस्मिन्व्रिवसिरित्वच्चरणयोः । न कस्याप्युन्नतयै भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः ॥१३॥ हे वरद ! वाणासुर ने आपको नमस्कार मात्र से इन्द्र की सम्पत्ति को नीचा दिखलाने वाली सम्पत्ति प्राप्त किया था और त्रिभुवनको अपना परिजन बना लिया था । यह आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि आपके चरणों में नमस्कार करना किस उन्नति का कारण नहीं होता है ॥ १३ ॥ अकाण्ड : ब्रह्माण्ड क्षयचकितदेवासुरकृपा । विधेयस्याऽसीद्यस्त्रिनयन विषं संहृतवतः ॥