शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (गन्धर्वराज पुष्पदन्त - सानुवाद सटीक)
Shiva Mahimna Stotram with Hindi Commentary
गन्धर्वराज पुष्पदन्त / आचार्य राजेश दीक्षित द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ शिवमहिम्नस्तोत्रम् तवैश्वर्यं यत्नाद्यदुपरिविरंचिर्हरिरधः । परिच्छेत्तुं यातावनलमनिलस्कन्धवपुषः ॥ ततोभक्ति श्रद्धाभरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश यत् । स्तयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति ।१०। हे गिरीश (गिरि में शयन करने वाले), तेजपुंज आपकी विभूति को ढूंढने के लिए ब्रह्मा आकाश तक और विष्णु पाताल तक जाकर भी उसे पाने में असमर्थ रहे, तत्पश्चात् उनकी कायिक, मानसिक और वाचिक सेवा से प्रसन्न होकर आप स्वयं प्रकट हुए, इससे यह निश्चित् है कि आपकी सेवा से ही सब सुलभ है ॥ १० ॥ अयत्नादापाद्यत्रिभुवनमवैरव्यतिकरम् । दशास्यो यद्वाहूनभृत रणकण्डूपरवशान् ॥ शिरः पद्मश्रेणीरचितचरणाम्भोरुहबलेः । स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम् ।११। हे त्रिपुरहर ! मस्तकरूपी कमल की माला को जिस रावण ने आपके कमलवत् चरणों में अर्पणकर के त्रिभुवन को निष्कण्टक बनाया था तथा युद्ध के लिए सर्वदा उत्सुक रहने वाली भुजाओं को पाया था, वह आपकी अविरल भक्ति का ही परिणाम था ॥ ११ ॥