शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (गन्धर्वराज पुष्पदन्त - सानुवाद सटीक)
Shiva Mahimna Stotram with Hindi Commentary
गन्धर्वराज पुष्पदन्त / आचार्य राजेश दीक्षित द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषा-टीका-सहितम् ५ महोक्षः खट्वांगम्परशुरजिनं भस्म फणिनः । कपालंचेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम् ॥ सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भ्रू प्रणिहिताम् । न हि स्वात्मारामं विषय मृगतृष्णा भ्रमयति ।८। हे वरद ! महोक्ष (बैल), खाट का पाया, परशु, गजचर्म, भस्म, सर्प, कपाल इत्यादि आपकी धारण सामग्रियाँ हैं, परन्तु उन ऋद्धियों को जो आपकी कृपा से प्राप्त देवता लोग भोगते हैं, आप क्यों नहीं भोगते ! स्वात्माराम (आत्मज्ञानी) को विषय (रूपरसादि) रूपी मृगतृष्णा नहीं भ्रमा सकती है ॥ ८ ॥ ध्रुवं कश्चित्सर्वं सकलमपरस्त्वद्ध्रुवमिदम् । परोध्रौव्याध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये ॥ समस्तेऽप्येतस्मिन्पुरमथन तैर्विस्मित इव । स्तुवञ्जिह्रेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता ।६। हे पुरमथन ! सांख्य मतानुयायी "नह्यसत उत्पत्तिः सम्भवति" के अनुसार जगत् को ध्रुव (नित्य), बुद्धिमतानुयायी अध्रुव (क्षणिक) तार्किकजन नित्य (आकाश आदि पञ्च और पृथिव्यादि परमाणु और अनित्य कार्यद्रव्य) दोनों मानते हैं । इन मतान्तरों से विस्मित मैं भी आपकी स्तुति करता हुआ लज्जित नहीं होता, क्योंकि वाचा- लता लज्जा को स्थान नहीं देती ॥ ६ ॥