शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (गन्धर्वराज पुष्पदन्त - सानुवाद सटीक)
Shiva Mahimna Stotram with Hindi Commentary
गन्धर्वराज पुष्पदन्त / आचार्य राजेश दीक्षित द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० शिवमहिम्नस्तोत्रम् रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिनगेन्द्रो धनुरथा- रथांगेचन्द्रार्कौ रथचरणपाणिः शर इति ॥ दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडम्बरविधि- विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः ।१८। हे ईश ! तृण के समान त्रिपुर को जलाने के लिए पृथ्वी को रथ, ब्रह्मा को सारथी, हिमालय को धनुष, सूर्य-चन्द्र को रथ का चक्र तथा विष्णु को विषधर बाण बनाना आपका आडम्बर मात्र है । विचित्र वस्तुओं से क्रीडा करते हुए समर्थों की बुद्धि स्वतन्त्र होती है ।। १८ ।। हरिस्ते साहस्त्रं कमलबलिमाधाय पदयो- र्यदेकोने तस्मिन्निजमुदहरन्नेत्रकमलम् । गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषा त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम् ।।१९।। हे त्रिपुरहर ! विष्णु आपके चरणों में प्रति दिन सहस्र कमलों का उपहार देते थे । एक दिन एक की कमी होने के कारण उन्होंने अपने एक कमलवत् नेत्र को निकाल कर पूरा किया । यह भक्ति की चरम सीमा चक्र के रूप में आज भी संसार की रक्षा किया करती है ।। १९ ।। ऋतौ सुप्ते जाग्रत्त्वमसि फलयोगे क्रतुमताम् । क्व कर्म प्रध्वस्तं फलतिपुरुषाराधनमृते ॥