शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (गन्धर्वराज पुष्पदन्त - सानुवाद सटीक)
Shiva Mahimna Stotram with Hindi Commentary
गन्धर्वराज पुष्पदन्त / आचार्य राजेश दीक्षित द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषा-टीका-सहितम् ११ अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदानप्रतिभुवम् । श्रुतौ श्रद्धां बद्ध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः ॥२०॥ हे त्रिपुरहर ! आप ही को यज्ञ के फल का दाता समझ कर, वेद में दृढ़ विश्वास कर मनुष्य कर्मों का आरम्भ करते हैं । क्रिया रूप यज्ञ के समाप्त होने पर आपही फल देने वाले रहते हैं । आपकी आराधना के बिना नष्ट कर्म फलदायक नहीं होता ॥ २० ॥ क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृता- मृषीणामात्विज्यं शरणद सदस्याः सुरगणाः । क्रतुभ्रंशस्त्वत्तः क्रतुफलविधानव्यसनिनो ध्रुवं कर्तुः श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखाः ॥२१॥ हे शरणद ! कर्मकुशल यज्ञपति दक्ष के यज्ञ के ऋषिगण ऋत्विज, देवता सदस्य थे । फिर भी यज्ञ के फल देने वाले आप की अप्रसन्नता से वह ध्वंस हो गया । निश्चय है कि आप में श्रद्धा-रहित किया गया यज्ञ नाश के लिए ही होता है ॥ २१ ॥ प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरम् । गतं रोहिद्भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा ॥ धनुःपाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममुम् । त्रसन्तन्तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः ॥२२॥