शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (गन्धर्वराज पुष्पदन्त - सानुवाद सटीक)
Shiva Mahimna Stotram with Hindi Commentary
गन्धर्वराज पुष्पदन्त / आचार्य राजेश दीक्षित द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ शिवमहिम्नस्तोत्रम् धारण करने वाले मृड (विष्णु), आपको बार-वार नमस्कार है । तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) से परे जो अनिर्वचनीय पद से विशिष्ट हैं, ऐसे आपको बार-बार नमस्कार है ॥ ३० ॥ कृशपरिणतिचेतः क्लेशवश्यं क्व चेदम् । क्व च तव गुणसीमोल्लङ्घिनीशश्वदृद्धिः ॥ इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधा- द्वरद चरणयोस्ते वाक्यपुष्पोपहारम् ॥३१॥ हे वरद ! कहाँ तो रागद्वेष आदि से कलुषित तथा तुच्छ मेरा मन, कहाँ आपकी अपरमित विभूति, तिसपर भी आपकी भक्ति ने मुझे निर्भय बनाकर इस वाक्रूपी पुष्पाञ्जलि को आपके चरण- कमलों में समर्पण करने के लिये वाध्य किया है ॥ ३१ ॥ असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे । सुरतरुवरशाखा लेखनीपत्रमुर्वी ॥ लिखत यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालम् । तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ॥३२॥ हे ईश ! असित अर्थात् काले पर्वत के समान कज्जल (स्याही) समुद्र के पात्र में हो, सुरवर (कल्पवृक्ष) के शाखा की उत्तम लेखनी हो और पृथ्वी कागज हो, इन साधनों को लेकर स्वयं शारदा यदि सर्वदा ही लिखती रहें तथापि वे आपके गुणों का पार नहीं पा सकतीं, तो मैं कौन हूँ ॥ ३२ ॥