शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (गन्धर्वराज पुष्पदन्त - सानुवाद सटीक)
Shiva Mahimna Stotram with Hindi Commentary
गन्धर्वराज पुष्पदन्त / आचार्य राजेश दीक्षित द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ शिवताण्डवस्तोत्रम् पत्थर और सुन्दर बिछौनों में, सांप और मुक्ता की माला में, बहुमूल्य रत्न तथा मिट्टी के ढेले में, मित्र या शत्रुपक्षमें, तृण अथवा कमललोचना तरुणी में, प्रजा और पृथ्वी के महाराज में समानभाव रखता हुआ मैं कब सदाशिव को भजूँगा ॥ १२ ॥ कदानिलिम्पनिर्झरीनिकुंजकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन् । विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवःम्यहम् ।१३। सुन्दर ललाटवाले भगवान् चन्द्रशेखर में दत्तचित्त हो अपने कुविचारों को त्यागकर गंगाजी के तटवर्ती निकुंज के भीतर रहता हुआ सिरपर हाथ जोड़ डबडबाई हुई विह्वल आंखों से 'शिव' मन्त्र का उच्चारण करता हुआ मैं कब सुखी होऊँगा ? ॥ १३ ॥ इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम् । हरे गुरौसुभक्तिमाशु यातिनान्यथा गतिं विमोहनं हि देहनां सुशंकरस्य चिन्तनम् ।१४। जो मनुष्य इस प्रकार से उक्त उत्तमोत्तम स्तोत्रका नित्य पाठ, स्मरण और वर्णन करता रहता है, वह सदा शुद्ध रहता है और शीघ्र ही सुरगुरु श्रीशंकरजीकी अच्छी भक्ति प्राप्त कर लेता है, वह विरुद्धगति को नहीं प्राप्त होताः क्योंकि श्रीशिवजी का अच्छी प्रकार चिन्तन प्राणिवर्गके मोह का नाश करने वाला है ॥ १४॥