शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (गन्धर्वराज पुष्पदन्त - सानुवाद सटीक)
Shiva Mahimna Stotram with Hindi Commentary
गन्धर्वराज पुष्पदन्त / आचार्य राजेश दीक्षित द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० शिवताण्डवस्तोत्रम् कलाओं से परे, कल्याण स्वरूप, कल्पका अन्त (प्रलय) करने वाले, सज्जनों को सदा आनन्द देने वाले, त्रिपुर के शत्रु, सच्चिदा- नन्दघन, मोहको हरने वाले, मनको मथ डालने वाले कामदेवके शत्रु हे प्रभो ! प्रसन्न हूजिये, प्रसन्न हूजिये ॥ ६ ॥ न यावद् उमानाथ पादारविन्दम् भजंतीह लोके परे वा नराणां न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ।७। जबतक पार्वती के पति आपके चरण कमलों को मनुष्य नहीं भजते, तबतक उन्हें न तो इह लोक और न परलोक में सुख शान्ति मिलती है और न उनके तापों का नाश होता है। अतः हे समस्त जीवोंके अन्दर (हृदयमें) निवास करनेवाले प्रभो! प्रसन्न हूजिए॥७।। न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं । जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं प्रभो पाहि आसन्नमामीश शंभो ।८। मैं न तो योग जानता हूँ, न जप और न पूजा ही। हे शम्भो ! मैं तो सदा-सर्वदा आपको ही नमस्कार करता हूँ। हे प्रभो ! बुढ़ापा तथा जन्म (-मृत्यु) के दुःखसमूहों से जलते हुए मुझ दुखी की दुःख से रक्षा कीजिए। हे ईश्वर ! हे शम्भो ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ८ ॥