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शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (गन्धर्वराज पुष्पदन्त - सानुवाद सटीक)

Shiva Mahimna Stotram with Hindi Commentary

गन्धर्वराज पुष्पदन्त / आचार्य राजेश दीक्षित द्वारा

DevanagariSanskritpublished35 पृष्ठ

३० शिवताण्डवस्तोत्रम् कलाओं से परे, कल्याण स्वरूप, कल्पका अन्त (प्रलय) करने वाले, सज्जनों को सदा आनन्द देने वाले, त्रिपुर के शत्रु, सच्चिदा- नन्दघन, मोहको हरने वाले, मनको मथ डालने वाले कामदेवके शत्रु हे प्रभो ! प्रसन्न हूजिये, प्रसन्न हूजिये ॥ ६ ॥ न यावद् उमानाथ पादारविन्दम् भजंतीह लोके परे वा नराणां न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ।७। जबतक पार्वती के पति आपके चरण कमलों को मनुष्य नहीं भजते, तबतक उन्हें न तो इह लोक और न परलोक में सुख शान्ति मिलती है और न उनके तापों का नाश होता है। अतः हे समस्त जीवोंके अन्दर (हृदयमें) निवास करनेवाले प्रभो! प्रसन्न हूजिए॥७।। न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं । जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं प्रभो पाहि आसन्नमामीश शंभो ।८। मैं न तो योग जानता हूँ, न जप और न पूजा ही। हे शम्भो ! मैं तो सदा-सर्वदा आपको ही नमस्कार करता हूँ। हे प्रभो ! बुढ़ापा तथा जन्म (-मृत्यु) के दुःखसमूहों से जलते हुए मुझ दुखी की दुःख से रक्षा कीजिए। हे ईश्वर ! हे शम्भो ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ८ ॥

भाषा-टीका-सहितम् ३१ श्लोक रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये । ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शंभुः प्रसीदति ।६। भगवान् रुद्र की स्तुति का यह अष्टक उन शंकरजीकी तुष्टि (प्रसन्नता) के लिए ब्राह्मणद्वारा कहा गया । जो मनुष्य इसे भक्ति- पूर्वक पढ़ते हैं, उनपर भगवान् शम्भु प्रसन्न होते हैं ॥ ६ ॥ इति श्रीगोस्वामितुलसीदासकृतं श्रीरुद्राष्टकं सम्पूर्णम् । — शिवपंचाक्षरस्तोत्र श्रीगणेशाय नमः ॥ नागेन्द्र हाराय त्रिलोचनाय भस्मांगरागाय महेश्वराय । नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नमः शिवाय ।१। मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय । मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै मकाराय नमः शिवाय ॥ २ ॥ शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय । श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै शिकाराय नमः शिवाय ॥ ३ ॥ वसिष्ठकुम्भोद्भव- गौतमार्यमुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय । चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै वकाराय नमः शिवाय ॥ ४ ॥ यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय । दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै यकाराय नमः शिवाय ॥ ५ ॥ पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ । शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥ ६ ॥ ॥ इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितं शिवपंचाक्षरस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ —

३२ पशुपति-अष्टक श्रीगणेशाय नमः ॥ पशुपतीन्दुपतिं धरणीपतिं भुजगलोकपतिं च सतीपतिम् । प्रणतभक्तजनार्तिहरं परं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ १ ॥ न जनको जननी न च सोदरो न तनयो न च भूरिबलं कुलम् । अवति कोऽपि न कालवशं गतं भजत० ॥ २ ॥ मुरजडिण्डिमवाद्य- विलक्षणं मधुरपंचमनादविशारदम् ॥ प्रमथभूतगणैरपि सेवितं भज० ॥ ३ ॥ शरणदं सुखदंशरणान्वितं शिव शिवेति शिवेति नतं नृणाम् । अभयदं करुणावरुणालयं भज० ॥ ४ ॥ नरशिरोरचितं मणिकुण्डलं भुजगहारमुदं वृषभध्वजम् । चितिरजोधवली कृतविग्रहं भज० ॥ ५ ॥ मखविनाशकरं शशिशेखरं सततमध्वरभाजिफलप्रदम् । प्रलयदग्धसु- रासुरमानवं भज० ॥ ६ ॥ मदमपास्य चिरं हृदि संस्थितं मरणजन्म- जराभयपीडितम् । जगदुदीक्ष्य समीपभयाकुलं भज० ॥ ७ ॥ हरिविरं- चिसुराधिपपूजितं यमजनेशधनेशनमस्कृतम् । त्रिनयनं भुवनत्रितया- धिपं भज० ॥ ८ ॥ पशुपतेरिदमष्टकमद्भुतं विरचितं पृथ्वीपतिसू- रिणा । पठति संशृणुते मनुजः सदा शिवपुरीं वसते लभते मुदम् ॥ ६ ॥ ॥ इति श्रीपशुपति-अष्टकं सम्पूर्णम् ॥ -: समाप्त :- मुद्रक : दीक्षित प्रेस, आगरा-४

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