शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* विद्येश्वरसंहिता *
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भक्त है, बाहर-भीतरसे पवित्र और शुद्ध है, उत्तम व्रतका पालन करनेवाला तथा दृढ़ निश्चयसे युक्त है, वह शिव-नैवेद्यका अवश्य भक्षण करे। भगवान् शिवका नैवेद्य अग्राह्य है, इस भावनाको मनसे निकाल दे। शिवके नैवेद्यको देख लेनेमात्रसे भी सारे पाप दूर भाग जाते हैं, उसको खा लेनेपर तो करोड़ों पुण्य अपने भीतर आ जाते हैं। आये हुए शिव-नैवेद्यको सिर झुकाकर प्रसन्नताके साथ ग्रहण करे और प्रयत्न करके शिव-स्मरणपूर्वक उसका भक्षण करे। आये हुए शिव-नैवेद्यको जो यह कहकर कि मैं इसे दूसरे समयमें ग्रहण करूँगा, लेनेमें विलम्ब कर देता है, वह मनुष्य निश्चय ही पापसे बँध जाता है। जिसने शिवकी दीक्षा ली हो, उस शिवभक्तके लिये यह शिव-नैवेद्य अवश्य भक्षणीय है—ऐसा कहा जाता है। शिवकी दीक्षासे युक्त शिवभक्त पुरुषके लिये सभी शिवलिंगोंका नैवेद्य शुभ एवं 'महाप्रसाद' है; अतः वह उसका अवश्य भक्षण करे। परंतु जो अन्य देवताओंकी दीक्षासे युक्त हैं और शिवभक्तिमें भी मनको लगाये हुए हैं, उनके लिये शिव-नैवेद्य-भक्षणके विषयमें क्या निर्णय है— इसे आपलोग प्रेमपूर्वक सुनें। ब्राह्मणो! जहाँसे शालग्रामशिलाकी उत्पत्ति होती है, वहाँके उत्पन्न लिंगमें, रस-लिंग (पारदलिंग)-में, पाषाण, रजत तथा सुवर्णसे निर्मित लिंगमें, देवताओं तथा सिद्धोंद्वारा प्रतिष्ठित लिंगमें, केसर-निर्मित लिंगमें, स्फटिकलिंगमें, रत्ननिर्मित लिंगमें तथा समस्त ज्योतिर्लिंगोंमें विराजमान भगवान् शिवके नैवेद्यका भक्षण चान्द्रायणव्रतके समान पुण्यजनक है। ब्रह्महत्या करनेवाला पुरुष भी यदि पवित्र होकर शिव-निर्माल्यका भक्षण करके उसे (सिरपर) धारण करे तो उसका सारा पाप शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। पर जहाँ चण्डका अधिकार है, वहाँ जो शिव-निर्माल्य हो, उसे साधारण मनुष्योंको नहीं खाना चाहिये। जहाँ चण्डका अधिकार नहीं है, वहाँके शिव-निर्माल्यका सभीको भक्तिपूर्वक भोजन करना चाहिये। बाणलिंग (नर्मदेश्वर), लोह-निर्मित (स्वर्णादि-धातुमय) लिंग, सिद्धलिंग (जिन लिंगोंकी उपासनासे किसीने सिद्धि प्राप्त की है अथवा जो सिद्धोंद्वारा स्थापित हैं वे लिंग), स्वयम्भूलिंग—इन सब लिंगोंमें तथा शिवकी प्रतिमाओं (मूर्तियों)-में चण्डका अधिकार नहीं है। जो मनुष्य शिवलिंगको विधिपूर्वक स्नान कराकर उस स्नानके जलका तीन बार आचमन करता है, उसके कायिक, वाचिक और मानसिक—तीनों प्रकारके पाप यहाँ शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। जो शिव-नैवेद्य, पत्र, पुष्प, फल और जल अग्राह्य है, वह सब भी शालग्रामशिलाके स्पर्शसे पवित्र—ग्रहणके योग्य हो जाता है। मुनीश्वरो! शिवलिंगके ऊपर चढ़ा हुआ जो द्रव्य है, वह अग्राह्य है। जो वस्तु लिंगस्पर्शसे रहित है अर्थात् जिस वस्तुको अलग रखकर शिवजीको निवेदित किया जाता है—लिंगके ऊपर चढ़ाया नहीं जाता, उसे अत्यन्त पवित्र जानना चाहिये। मुनिवरो! इस प्रकार नैवेद्यके विषयमें शास्त्रका निर्णय बताया गया।
अब तुमलोग सावधान हो आदरपूर्वक बिल्वका माहात्म्य सुनो। यह बिल्ववृक्ष महादेवका ही रूप है। देवताओंने भी इसकी