शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
स्तुति की है। फिर जिस किसी तरहसे इसकी महिमा कैसे जानी जा सकती है। तीनों लोकोंमें जितने पुण्य-तीर्थ प्रसिद्ध हैं, वे सम्पूर्ण तीर्थ बिल्वके मूलभागमें निवास करते हैं। जो पुण्यात्मा मनुष्य बिल्वके मूलमें लिंगस्वरूप अविनाशी महादेवजीका पूजन करता है, वह निश्चय ही शिवपदको प्राप्त होता है। जो बिल्वकी जड़के पास जलसे अपने मस्तकको सींचता है, वह सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नानका फल पा लेता है और वही इस भूतलपर पावन माना जाता है। इस बिल्वकी जड़के परम उत्तम थालेको जलसे भरा हुआ देखकर महादेवजी पूर्णतया संतुष्ट होते हैं। जो मनुष्य गन्ध, पुष्प आदिसे बिल्वके मूलभागका पूजन करता है, वह शिवलोकको पाता है और इस लोकमें भी उसकी सुख-संतति बढ़ती है। जो बिल्वकी जड़के समीप आदरपूर्वक दीपावली जलाकर रखता है, वह तत्त्वज्ञानसे सम्पन्न हो भगवान् महेश्वरमें मिल जाता है। जो बिल्वकी शाखा थामकर हाथसे उसके नये-नये पल्लव उतारता और उनसे उस बिल्वकी पूजा करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो बिल्वकी जड़के समीप भगवान् शिवमें अनुराग रखनेवाले एक भक्तको भी भक्तिपूर्वक भोजन कराता है, उसे कोटिगुना पुण्य प्राप्त होता है। जो बिल्वकी जड़के पास शिवभक्तको खीर और घृतसे युक्त अन्न देता है, वह कभी दरिद्र नहीं होता। ब्राह्मणो ! इस प्रकार मैंने सांगोपांग शिवलिंग-पूजनका वर्णन किया। यह प्रवृत्तिमार्गी तथा निवृत्तिमार्गी पूजकोंके भेदसे दो प्रकारका होता है। प्रवृत्तिमार्गी लोगोंके लिये पीठ-पूजा इस भूतलपर सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाली होती है। प्रवृत्त पुरुष सुपात्र गुरु आदिके द्वारा ही सारी पूजा सम्पन्न करे और अभिषेकके अन्तमें अगहनीके चावलसे बना हुआ नैवेद्य निवेदन करे। पूजाके अन्तमें शिवलिंगको शुद्ध सम्पुटमें विराजमान करके घरके भीतर कहीं अलग रख दे। निवृत्तिमार्गी उपासकोंके लिये हाथपर ही शिवपूजनका विधान है। उन्हें भिक्षा आदिसे प्राप्त हुए अपने भोजनको ही नैवेद्यरूपमें निवेदित कर देना चाहिये। निवृत्त पुरुषोंके लिये सूक्ष्म लिंग ही श्रेष्ठ बताया जाता है। वे विभूतिसे पूजन करें और विभूतिको ही नैवेद्यरूपसे निवेदित भी करें। पूजा करके उस लिंगको सदा अपने मस्तकपर धारण करें।
(अध्याय २१-२२)
शिवनाम-जप तथा भस्मधारणकी महिमा, त्रिपुण्ड्रके देवता और स्थान आदिका प्रतिपादन
ऋषि बोले—महाभाग व्यासशिष्य सूतजी ! आपको नमस्कार है। अब आप उस परम उत्तम भस्म-माहात्म्यका ही वर्णन कीजिये। भस्म-माहात्म्य, रुद्राक्ष-माहात्म्य तथा उत्तम नाम-माहात्म्य—इन तीनोंका परम प्रसन्नतापूर्वक प्रतिपादन कीजिये और हमारे हृदयको आनन्द दीजिये।
सूतजीने कहा—महर्षियो ! आपने बहुत उत्तम बात पूछी है। यह समस्त लोकोंके लिये हितकारक विषय है। जो