भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* रुद्रसंहिता * १३७

छिद्र है, वही अंधापन है और वही मूर्खता है। जो भगवान् शिवकी भक्तिमें तत्पर हैं, जो मनसे उन्हींको प्रणाम और उन्हींका चिन्तन करते हैं, वे कभी दुःखके भागी नहीं होते*। जो महान् सौभाग्यशाली पुरुष मनोहर भवन, सुन्दर आभूषणोंसे विभूषित स्त्रियाँ, जितनेसे मनको संतोष हो उतना धन, पुत्र-पौत्र आदि संतति, आरोग्य, सुन्दर शरीर, अलौकिक प्रतिष्ठा, स्वर्गीय सुख, अन्तमें मोक्षरूपी फल अथवा परमेश्वर शिवकी भक्ति चाहते हैं, वे पूर्वजन्मोंके महान् पुण्यसे भगवान् सदाशिवकी पूजा-अर्चामें प्रवृत्त होते हैं। जो पुरुष नित्य-भक्तिपरायण हो शिवलिंगकी पूजा करता है, उसको सफल सिद्धि प्राप्त होती है तथा वह पापोंके चक्करमें नहीं पड़ता।

भगवान्‌के इस प्रकार उपदेश देनेपर देवताओंने उन श्रीहरिको प्रणाम किया और मनुष्योंकी समस्त कामनाओंकी पूर्तिके लिये उनसे शिवलिंग देनेके लिये प्रार्थना की। मुनिश्रेष्ठ उस प्रार्थनाको सुनकर जीवोंके उद्धारमें तत्पर रहनेवाले भगवान् विष्णुने विश्वकर्माको बुलाकर कहा—'विश्वकर्मन्! तुम मेरी आज्ञासे सम्पूर्ण देवताओंको सुन्दर शिवलिंगका निर्माण करके दो।' तब विश्वकर्माने मेरी और श्रीहरिकी आज्ञाके अनुसार उन देवताओंको उनके अधिकारके अनुसार शिवलिंग बनाकर दिये।

मुनिश्रेष्ठ नारद! किस देवताको कौन-सा शिवलिंग प्राप्त हुआ, इसका वर्णन आज मैं कर रहा हूँ; उसे सुनो। इन्द्र पद्मराग-मणिके बने हुए शिवलिंगकी और कुबेर सुवर्णमय लिंगकी पूजा करते हैं। धर्म पीतमणिमय (पुखराजके बने हुए) लिंगकी तथा वरुण श्यामवर्णके शिवलिंगकी पूजा करते हैं। भगवान् विष्णु इन्द्रनीलमय तथा ब्रह्मा हेममय लिंगकी पूजा करते हैं। मुने ! विश्वेदेवगण चाँदीके शिवलिंगकी, वसुगण पीतलके बने हुए लिंगकी तथा दोनों अश्विनीकुमार पार्थिवलिंगकी पूजा करते हैं। लक्ष्मीदेवी स्फटिकमय लिंगकी, आदित्यगण ताम्रमय लिंगकी, राजा सोम मोतीके बने हुए लिंगकी तथा अग्निदेव वज्र (हीरे)-के लिंगकी उपासना करते हैं। श्रेष्ठ ब्राह्मण और उनकी पत्नियाँ मिट्टीके बने हुए शिवलिंगका, मयासुर चन्दननिर्मित लिंगका और नागगण मूँगेके बने हुए शिवलिंगका आदरपूर्वक पूजन करते हैं। देवी मक्खनके बने हुए लिंगकी, योगीजन भस्ममय लिंगकी, यक्षगण दधिनिर्मित लिंगकी, छायादेवी आटेसे बनाये हुए लिंगकी और ब्रह्मपत्नी रत्नमय शिवलिंगकी निश्चितरूपसे पूजा करती हैं। बाणासुर पारद या पार्थिवलिंगकी पूजा करता है। दूसरे लोग भी ऐसा ही करते हैं। ऐसे-ऐसे शिवलिंग बनाकर विश्वकर्माने विभिन्न लोगोंको दिये तथा वे सब देवता और ऋषि उन लिंगोंकी पूजा करते हैं। भगवान् विष्णुने इस तरह देवताओंको उनके हितकी कामनासे शिवलिंग देकर उनसे तथा मुझ ब्रह्मासे पिनाकपाणि महादेवके पूजनकी विधि भी


* भवभक्तिपरा ये च भवप्रणतचेतसः। भवसंस्मरणा ये च न ते दुःखस्य भाजनाः॥
(शि० पु० रु० सृ० खं० १२। २१)