भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१३८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

बतायी। पूजन-विधिसम्बन्धी उनके वचनोंको सुनकर देवशिरोमणियोंसहित मैं ब्रह्मा हृदयमें हर्ष लिये अपने धाममें आ गया। मुने! वहाँ आकर मैंने समस्त देवताओं और ऋषियोंको शिव-पूजाकी उत्तम विधि बतायी, जो सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाली है।

उस समय मुझ ब्रह्माने कहा—देवताओंसहित समस्त ऋषियो! तुम प्रेमपरायण होकर सुनो; मैं प्रसन्नतापूर्वक तुमसे शिवपूजनकी उस विधिका वर्णन करता हूँ, जो भोग और मोक्ष देनेवाली है। देवताओ और मुनीश्वरो! समस्त जन्तुओंमें मनुष्य-जन्म प्राप्त करना प्रायः दुर्लभ है। उनमें भी उत्तम कुलमें जन्म तो और भी दुर्लभ है। उत्तम कुलमें भी आचारवान् ब्राह्मणोंके यहाँ उत्पन्न होना उत्तम पुण्यसे ही सम्भव है। यदि वैसा जन्म सुलभ हो जाय तो भगवान् शिवके सन्तोषके लिये उस उत्तम कर्मका अनुष्ठान करे, जो अपने वर्ण और आश्रमके लिये शास्त्रोंद्वारा प्रतिपादित है। जिस जातिके लिये जो कर्म बताया गया है, उसका उल्लंघन न करे। जितनी सम्पत्ति हो, उसके अनुसार ही दान करे। कर्ममय सहस्रों यज्ञोंसे तपोधज्ञ बढ़कर है। सहस्रों तपोधज्ञोंसे जपयज्ञका महत्त्व अधिक है। ध्यानयज्ञसे बढ़कर कोई वस्तु नहीं है। ध्यान ज्ञानका साधन है; क्योंकि योगी ध्यानके द्वारा अपने इष्टदेव समरस शिवका साक्षात्कार करता है।$^१$ ध्यानयज्ञमें तत्पर रहनेवाले उपासकके लिये भगवान् शिव सदा ही संनिहित हैं। जो विज्ञानसे सम्पन्न हैं, उन पुरुषोंकी शुद्धिके लिये किसी प्रायश्चित्त आदिकी आवश्यकता नहीं है।

मनुष्यको जबतक ज्ञानकी प्राप्ति न हो, तबतक वह विश्वास दिलानेके लिये कर्मसे ही भगवान् शिवकी आराधना करे। जगत्के लोगोंको एक ही परमात्मा अनेक रूपोंमें अभिव्यक्त हो रहा है। एकमात्र भगवान् सूर्य एक स्थानमें रहकर भी जलाशय आदि विभिन्न वस्तुओंमें अनेक-से दीखते हैं। देवताओ! संसारमें जो-जो सत् या असत् वस्तु देखी या सुनी जाती है, वह सब परब्रह्म शिवरूप ही है—ऐसा समझो। जबतक तत्त्वज्ञान न हो जाय, तबतक प्रतिमाकी पूजा आवश्यक है। ज्ञानके अभावमें भी जो प्रतिमा-पूजाकी अवहेलना करता है, उसका पतन निश्चित है। इसलिये ब्राह्मणो! यह यथार्थ बात सुनो। अपनी जातिके लिये जो कर्म बताया गया है, उसका प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिये। जहाँ-जहाँ यथावत् भक्ति हो, उस-उस आराध्य-देवका पूजन आदि अवश्य करना चाहिये; क्योंकि पूजन और दान आदिके बिना पातक दूर नहीं होते।$^२$ जैसे मैले कपड़ेमें रंग बहुत अच्छा नहीं चढ़ता है किंतु जब उसको धोकर स्वच्छ कर लिया जाता है, तब उसपर सब रंग अच्छी तरह चढ़ते हैं,


१. ध्यानयज्ञात्परं नास्ति ध्यानं ज्ञानस्य साधनम्। यतः समरसं स्वेष्टं योगी ध्यानेन पश्यति॥ (शि० पु० रु० सृ० १२। ४६)
२. यत्र यत्र यथाभक्तिः कर्तव्यं पूजनादिकम्। विना पूजनदानादि पातकं न च दूरतः॥ (शि० पु० रु० सृ० खं० १२। ६९)