शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* रुद्रसंहिता * १३९
उसी प्रकार देवताओंकी भलीभाँति पूजासे जब त्रिविध शरीर पूर्णतया निर्मल हो जाता है, तभी उसपर ज्ञानका रंग चढ़ता है और तभी विज्ञानका प्राकट्य होता है। जब विज्ञान हो जाता है, तब भेदभावकी निवृत्ति हो जाती है। भेदकी सम्पूर्णतया निवृत्ति हो जानेपर द्वन्द्व-दुःख दूर हो जाते हैं और द्वन्द्व-दुःखसे रहित पुरुष शिवरूप हो जाता है।
मनुष्य जबतक गृहस्थ-आश्रममें रहे, तबतक पाँचों देवताओंकी तथा उनमें श्रेष्ठ भगवान् शंकरकी प्रतिमाका उत्तम प्रेमके साथ पूजन करे। अथवा जो सबके एकमात्र मूल हैं, उन भगवान् शिवकी ही पूजा सबसे बढ़कर है; क्योंकि मूलके सींचे जानेपर शाखास्थानीय सम्पूर्ण देवता स्वतः तृप्त हो जाते हैं। अतः जो सम्पूर्ण मनोवांछित फलोंको पाना चाहता है, वह अपने अभीष्टकी सिद्धिके लिये समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहकर लोककल्याणकारी भगवान् शंकरका पूजन करे। (अध्याय १२)
शिवपूजनकी सर्वोत्तम विधिका वर्णन
ब्रह्माजी कहते हैं—अब मैं पूजाकी सर्वोत्तम विधि बता रहा हूँ, जो समस्त अभीष्ट तथा सुखोंको सुलभ करानेवाली है। देवताओ तथा ऋषियो! तुम ध्यान देकर सुनो। उपासकको चाहिये कि वह ब्राह्ममुहूर्तमें शयनसे उठकर जगदम्बा पार्वतीसहित भगवान् शिवका स्मरण करे तथा हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर भक्तिपूर्वक उनसे प्रार्थना करे—'देवेश्वर! उठिये, उठिये! मेरे हृदय-मन्दिरमें शयन करनेवाले देवता! उठिये! उमाकान्त! उठिये और ब्रह्माण्डमें सबका मंगल कीजिये। मैं धर्मको जानता हूँ, किंतु मेरी उसमें प्रवृत्ति नहीं होती। मैं अधर्मको जानता हूँ, परंतु मैं उससे दूर नहीं हो पाता। महादेव! आप मेरे हृदयमें स्थित होकर मुझे जैसी प्रेरणा देते हैं, वैसा ही मैं करता हूँ।' इस प्रकार भक्तिपूर्वक कहकर और गुरुदेवकी चरणपादुकाओंका स्मरण करके गाँवसे बाहर दक्षिणदिशामें मल-मूत्रका त्याग करनेके लिये जाय।
मलत्याग करनेके बाद मिट्टी और जलसे धोनेके द्वारा शरीरकी शुद्धि करके दोनों हाथों और पैरोंको धोकर दतुअन करे, सूर्योदय होनेसे पहले ही दतुअन करके मुँहको सोलह बार जलकी अंजलियोंसे धोये। देवताओ तथा ऋषियो! षष्ठी, प्रतिपदा, अमावस्या और नवमी तिथियों तथा रविवारके दिन शिवभक्तको यत्नपूर्वक दतुअनको त्याग देना चाहिये। अवकाशके अनुसार नदी आदिमें जाकर अथवा घरमें ही भलीभाँति स्नान करे। मनुष्यको देश और कालके विरुद्ध स्नान नहीं करना चाहिये। रविवार, श्राद्ध, संक्रान्ति, ग्रहण, महादान, तीर्थ, उपवास-दिवस अथवा अशौच प्राप्त होनेपर मनुष्य गरम जलसे स्नान न करे। शिवभक्त मनुष्य तीर्थ आदिमें प्रवाहके सम्मुख होकर स्नान करे। जो नहानेके पहले तेल लगाना चाहे, उसे विहित एवं निषिद्ध दिनोंका विचार करके ही तैलाभ्यंग करना चाहिये। जो प्रतिदिन नियमपूर्वक तेल