शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* रुद्रसंहिता * १५३
नाम था दम। वह निरन्तर भगवान् शिवकी सेवामें लगा रहता था। बालक होनेपर भी वह दूसरे बालकोंके साथ शिवका भजन किया करता था। वह क्रमशः युवावस्थाको प्राप्त हुआ और पिताके परलोकगमनके पश्चात् राजसिंहासनपर बैठा।
राजा दम बड़ी प्रसन्नताके साथ सब ओर शिवधर्मोंका प्रचार करने लगे। भूपाल दमका दमन करना दूसरोंके लिये सर्वथा कठिन था। ब्रह्मन्! समस्त शिवालयोंमें दीपदान करनेके अतिरिक्त वे दूसरे किसी धर्मको नहीं जानते थे। उन्होंने अपने राज्यमें रहनेवाले समस्त ग्रामाध्यक्षोंको बुलाकर यह आज्ञा दे दी कि ‘शिवमन्दिरमें दीपदान करना सबके लिये अनिवार्य होगा। जिस-जिस ग्रामाध्यक्षके गाँवके पास जितने शिवालय हों, वहाँ-वहाँ बिना कोई विचार किये सदा दीप जलाना चाहिये।’ आजीवन इसी धर्मका पालन करनेके कारण राजा दमने बहुत बड़ी धर्मसम्पत्तिका संचय कर लिया। फिर वे काल-धर्मके अधीन हो गये। दीपदानकी वासनासे युक्त होनेके कारण उन्होंने शिवालयोंमें बहुत-से दीप जलवाये और उसके फलस्वरूप जन्मान्तरमें वे रत्नमय दीपोंकी प्रभाके आश्रय हो अलकापुरीके स्वामी हुए। इस प्रकार भगवान् शिवके लिये किया हुआ थोड़ा-सा भी पूजन या आराधन समयानुसार महान् फल देता है, ऐसा जानकर उत्तम सुखकी इच्छा रखनेवाले लोगोंको शिवका भजन अवश्य करना चाहिये। वह दीक्षितका पुत्र, जो सदा सब प्रकारके अधर्मोंमें ही रचा-पचा रहता था, दैवयोगसे शिवालयमें धन चुरानेके लिये गया और उसने स्वार्थवश अपने कपड़ेको दीपककी बत्ती बनाकर उसके प्रकाशसे शिवलिंगके ऊपरका अँधेरा दूर कर दिया; इस सत्कर्मके फलस्वरूप वह कलिंगदेशका राजा हुआ और धर्ममें उसका अनुराग हो गया। फिर दीपकी वासनाका उदय होनेसे शिवालयोंमें दीप जलवाकर उसने यह दिक्पालका पद पा लिया। मुनीश्वर! देखो तो सही, कहाँ उसका वह कर्म और कहाँ यह दिक्पालकी पदवी, जिसका यह मानवधर्मा प्राणी इस समय यहाँ उपभोग कर रहा है। तात! यह तो उसके ऊपर शिवके संतुष्ट होनेकी बात बतायी गयी। अब एकचित्त होकर यह सुनो कि किस प्रकार सदाके लिये उसकी भगवान् शिवके साथ मित्रता हो गयी। मैं इस प्रसंगका तुमसे वर्णन करता हूँ।
नारद! पहलेके पाद्मकल्पकी बात है, मुझ ब्रह्माके मानस पुत्र पुलस्त्यसे विश्रवाका जन्म हुआ और विश्रवाके पुत्र वैश्रवण (कुबेर) हुए। उन्होंने पूर्वकालमें अत्यन्त उग्र तपस्याके द्वारा त्रिनेत्रधारी महादेवकी आराधना करके विश्वकर्माकी बनायी हुई इस अलकापुरीका उपभोग किया। जब वह कल्प व्यतीत हो गया और मेघवाहनकल्प आरम्भ हुआ, उस समय वह यज्ञदत्तका पुत्र, जो प्रकाशका दान करनेवाला था, कुबेरके रूपमें अत्यन्त दुःसह तपस्या करने लगा। दीपदानमात्रसे मिलनेवाली शिवभक्तिके प्रभावको जानकर वह शिवकी चित्रप्रकाशिका काशिकापुरीमें गया और अपने चित्तरूपी रत्नमय प्रदीपोंसे ग्यारह रुद्रोंको उद्बोधित करके अनन्यभक्ति एवं स्नेहसे सम्पन्न हो वह तन्मयतापूर्वक शिवके ध्यानमें मग्न हो निश्चलभावसे बैठ गया। जो शिवकी एकताका महान् पात्र है, तपरूपी अग्निसे बढ़ा हुआ है, काम-