भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 168

१५४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

क्रोधादि महाविघ्नरूपी पतंगोंके आघातसे शून्य है, प्राणनिरोधरूपी वायुशून्य स्थानमें निश्चलभावसे प्रकाशित है, निर्मल दृष्टिके कारण स्वरूपसे भी निर्मल है तथा सद्भावरूपी पुष्पोंसे जिसकी पूजा की गयी है, ऐसे शिवलिंगकी प्रतिष्ठा करके वह तबतक तपस्यामें लगा रहा, जबतक उसके शरीरमें केवल अस्थि और चर्ममात्र ही अवशिष्ट नहीं रह गये। इस प्रकार उसने दस हजार वर्षोंतक तपस्या की। तदनन्तर विशालाक्षी पार्वतीदेवीके साथ भगवान् विश्वनाथ कुबेरके पास आये। उन्होंने प्रसन्नचित्तसे अलकापतिकी ओर देखा। वे शिवलिंगमें मनको एकाग्र करके ठूंठे काठकी भाँति स्थिरभावसे बैठे थे। भगवान् शिवने उनसे कहा—'अलकापते! मैं वर देनेके लिये उद्यत हूँ। तुम अपना मनोरथ बताओ।'

यह वाणी सुनकर तपस्याके धनी कुबेरने ज्यों ही आँखें खोलकर देखा, त्यों ही उमावल्लभ भगवान् श्रीकण्ठ सामने खड़े दिखायी दिये। वे उदयकालके सहस्रों सूर्योंसे भी अधिक तेजस्वी थे और उनके मस्तकपर चन्द्रमा अपनी चाँदनी बिखेर रहे थे। भगवान् शंकरके तेजसे उनकी आँखें चौंधिया गयीं। उनका तेज प्रतिहत हो गया और वे नेत्र बंद करके मनोरथसे भी परे विराजमान देवदेवेश्वर शिवसे बोले—'नाथ! मेरे नेत्रोंको वह दृष्टिशक्ति दीजिये, जिससे आपके चरणारविन्दोंका दर्शन हो सके। स्वामिन्! आपका प्रत्यक्ष दर्शन हो, यही मेरे लिये सबसे बड़ा वर है। ईश! दूसरे किसी वरसे मेरा क्या प्रयोजन है। चन्द्रशेखर! आपको नमस्कार है।'

कुबेरकी यह बात सुनकर देवाधिदेव उमापतिने अपनी हथेलीसे उनका स्पर्श करके उन्हें देखनेकी शक्ति प्रदान की। दृष्टिशक्ति मिल जानेपर यज्ञदत्तके उस पुत्रने आँखें फाड़-फाड़कर पहले उमाकी ओर ही देखना आरम्भ किया। वह मन-ही-मन सोचने लगा, 'भगवान् शंकरके समीप यह सर्वांगसुन्दरी कौन है? इसने कौन-सा ऐसा तप किया है, जो मेरी भी तपस्यासे बढ़ गया है। यह रूप, यह प्रेम, यह सौभाग्य और यह असीम शोभा—सभी अद्भुत हैं।' वह ब्राह्मणकुमार बार-बार यही कहने लगा। जब बार-बार यही कहता हुआ वह क्रूर दृष्टिसे उनकी ओर देखने लगा, तब वामाके अवलोकनसे उसकी बायीं आँख फूट गयी। तदनन्तर देवी पार्वतीने महादेवजीसे कहा—'प्रभो! यह दुष्ट तपस्वी बार-बार मेरी ओर देखकर क्या बक रहा है? आप मेरी तपस्याके तेजको प्रकट कीजिये।' देवीकी यह बात सुनकर भगवान् शिवने हँसते हुए उनसे कहा—'उमे! यह तुम्हारा पुत्र है। यह तुम्हें क्रूर दृष्टिसे नहीं देखता, अपितु तुम्हारी तपःसम्पत्तिका वर्णन कर रहा है।' देवीसे ऐसा कहकर भगवान् शिव पुनः उस ब्राह्मणकुमारसे बोले—'वत्स! मैं तुम्हारी तपस्यासे संतुष्ट होकर तुम्हें वर देता हूँ। तुम निधियोंके स्वामी और गुह्यकोंके राजा हो जाओ। सुव्रत! यक्षों, किन्नरों और राजाओंके भी राजा होकर पुण्यजनोंके पालक और सबके लिये धनके दाता बनो। मेरे साथ तुम्हारी सदा मैत्री बनी रहेगी और मैं नित्य तुम्हारे निकट निवास करूँगा। मित्र! तुम्हारी प्रीति बढ़ानेके लिये मैं अलकाके पास ही रहूँगा। आओ, इन उमादेवीके चरणोंमें साष्टांग प्रणाम करो; क्योंकि ये तुम्हारी माता हैं। महाभक्त यज्ञदत्तकुमार! तुम अत्यन्त प्रसन्नचित्तसे इनके चरणोंमें गिर जाओ।'