शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
तटपर बैठी हुई संध्यासे उपलक्षित हो उसी तरह सुशोभित हो रहा था, जैसे प्रदोषकालमें उदित हुए चन्द्रमा और नक्षत्रोंसे युक्त आकाश शोभा पाता है। सुन्दर भाववाली संध्याको वहाँ बैठी देख मुनिने कौतूहलपूर्वक उस बृहल्लोहित नामवाले सरोवरको अच्छी तरह देखा। उसी प्रकारभूत पर्वतके शिखरसे दक्षिण समुद्रकी ओर जाती हुई चन्द्रभागा नदीका भी उन्होंने दर्शन किया। जैसे गंगा हिमालयसे निकलकर समुद्रकी ओर जाती है, उसी प्रकार चन्द्रभागके पश्चिम शिखरका भेदन करके वह नदी समुद्रकी ओर जा रही थी। उस चन्द्रभाग पर्वतपर बृहल्लोहित सरोवरके किनारे बैठी हुई संध्याको देखकर वसिष्ठजीने आदरपूर्वक पूछा।
वसिष्ठजी बोले—भद्रे ! तुम इस निर्जन पर्वतपर किसलिये आयी हो? किसकी पुत्री हो और तुमने यहाँ क्या करनेका विचार किया है? मैं यह सब सुनना चाहता हूँ। यदि छिपानेयोग्य बात न हो तो बताओ।
महात्मा वसिष्ठकी यह बात सुनकर संध्याने उन महात्माकी ओर देखा। वे अपने तेजसे प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो ब्रह्मचर्य देह धारण करके आ गया हो। वे मस्तकपर जटा धारण किये बड़ी शोभा पा रहे थे। संध्याने उन तपोधनको आदरपूर्वक प्रणाम करके कहा।
संध्या बोली—ब्रह्मन्! मैं ब्रह्माजीकी पुत्री हूँ। मेरा नाम संध्या है और मैं तपस्या करनेके लिये इस निर्जन पर्वतपर आयी हूँ। यदि मुझे उपदेश देना आपको उचित जान पड़े तो आप मुझे तपस्याकी विधि बताइये। मैं यही करना चाहती हूँ। दूसरी कोई भी गोपनीय बात नहीं है। मैं तपस्याके भावको—उसके करनेके नियमको बिना जाने ही तपोवनमें आ गयी हूँ। इसलिये चिन्तासे सूखी जा रही हूँ और मेरा हृदय काँपता है।
संध्याकी बात सुनकर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ वसिष्ठजीने, जो स्वयं सारे कार्योंके ज्ञाता थे, उससे दूसरी कोई बात नहीं पूछी। वह मन-ही-मन तपस्याका निश्चय कर चुकी थी और उसके लिये अत्यन्त उद्यमशील थी। उस समय वसिष्ठने मनसे भक्तवत्सल भगवान् शंकरका स्मरण करके इस प्रकार कहा।
वसिष्ठजी बोले—शुभानने ! जो सबसे महान् और उत्कृष्ट तेज हैं, जो उत्तम और महान् तप हैं तथा जो सबके परमाराध्य परमात्मा हैं, उन भगवान् शम्भुको तुम हृदयमें धारण करो। जो अकेले ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके आदिकारण हैं, उन त्रिलोकीके आदिस्रष्टा, अद्वितीय पुरुषोत्तम शिवका भजन करो। आगे बताये जानेवाले मन्त्रसे देवेश्वर शम्भुकी आराधना करो। उससे तुम्हें सब कुछ मिल जायगा, इसमें संशय नहीं है। ‘ॐ नमः शंकराय ॐ’ इस मन्त्रका निरन्तर जप करते हुए मौन तपस्या आरम्भ करो और जो मैं नियम बताता हूँ, उन्हें सुनो। तुम्हें मौन रहकर ही स्नान करना होगा, मौनालम्बनपूर्वक ही महादेवजीकी पूजा करनी होगी। प्रथम दो बार छठे समयमें तुम केवल जलका पूर्ण आहार कर सकती हो। जब तीसरी बार छठा समय आये, तब केवल उपवास किया करो। इस तरह तपस्याकी समाप्तितक छठे कालमें
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