भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* रुद्रसंहिता * १६३

जलाहार एवं उपवासकी क्रिया होती रहेगी।
देवि! इस प्रकार की जानेवाली मौन
तपस्या ब्रह्मचर्यका फल देनेवाली तथा
सम्पूर्ण अभीष्ट मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली
होती है। यह सत्य है, सत्य है, इसमें संशय
नहीं है। अपने चित्तमें ऐसा शुभ उद्देश्य
लेकर इच्छानुसार शंकरजीका चिन्तन
करो, वे प्रसन्न होनेपर तुम्हें अवश्य ही
अभीष्ट फल प्रदान करेंगे।

इस तरह संध्याको तपस्या करनेकी
विधिका उपदेश दे मुनिवर वसिष्ठ
यथोचितरूपसे उससे विदा ले वहीं
अन्तर्धान हो गये।

(अध्याय ३–५)


संध्याकी तपस्या, उसके द्वारा भगवान् शिवकी स्तुति तथा उससे संतुष्ट हुए शिवका उसे अभीष्ट वर दे मेधातिथिके यज्ञमें भेजना

ब्रह्माजी कहते हैं—मेरे पुत्रोंमें श्रेष्ठ महाप्राज्ञ नारद! तपस्याके नियमका उपदेश दे जब वसिष्ठजी अपने घर चले गये, तब तपके उस विधानको समझकर संध्या मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुई। फिर तो वह सानन्द मनसे तपस्विनीके योग्य वेष बनाकर बृहल्लोहित सरोवरके तटपर ही तपस्या करने लगी। वसिष्ठजीने तपस्याके लिये जिस मन्त्रको साधन बताया था, उसीसे उत्तम भक्तिभावके साथ वह भगवान् शंकरकी आराधना करने लगी। उसने भगवान् शिवमें अपने चित्तको लगा दिया और एकाग्र मनसे वह बड़ी भारी तपस्या करने लगी। उस तपस्यामें लगे हुए उसके चार युग व्यतीत हो गये। तब भगवान् शिव उसकी तपस्यासे संतुष्ट हो बड़े प्रसन्न हुए तथा बाहर-भीतर और आकाशमें अपने स्वरूपका दर्शन कराकर जिस रूपका वह चिन्तन करती थी, उसी रूपसे उसकी आँखोंके सामने प्रकट हो गये। उसने मनसे जिनका चिन्तन किया था, उन्हीं प्रभु शंकरको अपने सामने खड़ा देख वह अत्यन्त आनन्दमें निमग्न हो गयी। भगवान्‌का मुखारविन्द बड़ा प्रसन्न दिखायी देता था। उनके स्वरूपसे शान्ति बरस रही थी। वह सहसा भयभीत हो सोचने लगी कि ‘मैं भगवान् हरसे क्या कहूँ? किस तरह इनकी स्तुति करूँ?’ इसी चिन्तामें पड़कर उसने अपने दोनों नेत्र बंद कर लिये। नेत्र बंद कर लेनेपर भगवान् शिवने उसके हृदयमें प्रवेश करके


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