शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 182, कुल 850 में से
संदर्भ में पढ़ें१६८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
आज्ञासे उसके सुवर्ण-जैसे शरीरको जलाकर शुद्ध करके पुनः सूर्यमण्डलमें पहुँचा दिया। तब सूर्यने पितरों और देवताओं-की तृप्तिके लिये उसे दो भागोंमें विभक्त करके अपने रथमें स्थापित कर दिया।
मुनीश्वर! उसके शरीरका ऊपरी भाग प्रातःसंध्या हुआ, जो दिन और रातके बीचमें पड़नेवाली आदिसंध्या है तथा उसके शरीरका शेष भाग सायंसंध्या हुआ, जो दिन और रातके मध्यमें होनेवाली अन्तिम संध्या है! सायंसंध्या सदा ही पितरोंको प्रसन्नता प्रदान करनेवाली होती है। सूर्योदयसे पहले जब अरुणोदय हो— प्राचीके क्षितिजमें लाली छा जाय, तब प्रातःसंध्या प्रकट होती है, जो देवताओंको प्रसन्न करनेवाली है। जब लाल कमलके समान सूर्य अस्त हो जाते हैं, उसी समय सदा सायंसंध्याका उदय होता है, जो पितरोंको आनन्द प्रदान करनेवाली है। परम दयालु भगवान् शिवने उसके मनसहित प्राणोंको दिव्य शरीरसे युक्त देहधारी बना दिया। जब मुनिके यज्ञकी समाप्तिका अवसर आया, तब वह अग्निकी ज्वालामें महर्षि मेधातिथिको तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाली पुत्रीके रूपमें प्राप्त हुई। मुनिने बड़े आमोदके साथ उस समय उस पुत्रीको ग्रहण किया। मुने! उन्होंने यज्ञके लिये उसे नहलाकर अपनी गोदमें बिठा लिया। शिष्योंसे घिरे हुए महामुनि मेधातिथिको वहाँ बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ। उन्होंने उसका नाम 'अरुन्धती' रखा। वह किसी भी कारणसे धर्मका अवरोध नहीं करती थी; अतः उसी गुणके कारण उसने स्वयं यह त्रिभुवन-विख्यात नाम प्राप्त किया। देवर्षे! यज्ञको समाप्त करके कृतकृत्य हो वे मुनि पुत्रीकी प्राप्ति होनेसे बहुत प्रसन्न थे और अपने शिष्योंके साथ आश्रममें रहकर सदा उसीका लालन-पालन करते थे। देवी अरुन्धती चन्द्रभागा नदीके तटपर तापसारण्यके भीतर मुनिवर मेधातिथिके उस आश्रममें धीरे-धीरे बड़ी होने लगी। जब वह विवाहके योग्य हो गयी, तब मैंने, विष्णु तथा महेश्वरने मिलकर मुझ ब्रह्माके पुत्र वसिष्ठके साथ उसका विवाह करा दिया। ब्रह्मा, विष्णु तथा महेशके हाथोंसे निकले हुए जलसे शिप्रा आदि सात परम पवित्र नदियाँ उत्पन्न हुईं।
मुने! मेधातिथिकी पुत्री महासाध्वी अरुन्धती समस्त पतिव्रताओंमें श्रेष्ठ थी, वह महर्षि वसिष्ठको पतिरूपमें पाकर उनके साथ बड़ी शोभा पाने लगी। उससे शक्ति