भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 183
  • रुद्रसंहिता * १६१

आदि शुभ एवं श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुए। मुनिश्रेष्ठ! वह प्रियतम पति वसिष्ठको पाकर विशेष शोभा पाने लगी। मुनि- शिरोमणे! इस प्रकार मैंने तुम्हारे समक्ष संध्याके पवित्र चरित्रका वर्णन किया है, जो समस्त कामनाओंके फलोंको देनेवाला, परम पावन और दिव्य है। जो स्त्री या शुभ व्रतका आचरण करनेवाला पुरुष इस प्रसंगको सुनता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।

प्रजापति ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर नारदजीका मन प्रसन्न हो गया और वे इस प्रकार बोले।

नारदजीने कहा—ब्रह्मन्! आपने अरुन्धतीकी तथा पूर्वजन्ममें उसकी स्वरूपभूता संध्याकी बड़ी उत्तम दिव्य कथा सुनायी है, जो शिवभक्तिकी वृद्धि करनेवाली है। धर्मज्ञ! अब आप भगवान् शिवके उस परम पवित्र चरित्रका वर्णन कीजिये, जो दूसरोंके पापोंका विनाश करनेवाला, उत्तम एवं मंगलदायक है। जब कामदेव रतिसे विवाह करके हर्षपूर्वक चला गया, दक्ष आदि अन्य मुनि भी जब अपने-अपने स्थानको पधारे और जब संध्या तपस्या करनेके लिये चली गयी, उसके बाद वहाँ क्या हुआ?

ब्रह्माजीने कहा—विप्रवर नारद! तुम धन्य हो, भगवान् शिवके सेवक हो; अतः शिवकी लीलासे युक्त जो उनका शुभ चरित्र है, उसे भक्तिपूर्वक सुनो। तात! पूर्वकालमें मैं एक बार जब मोहमें पड़ गया और भगवान् शंकरने मेरा उपहास किया, तब मुझे बड़ा क्षोभ हुआ था। वस्तुतः शिवकी मायाने मुझे मोह लिया था, इसलिये मैं भगवान् शिवके प्रति ईर्ष्या करने लगा। किस प्रकार, सो बताता हूँ; सुनो। मैं उस स्थानपर गया, जहाँ दक्षराज मुनि उपस्थित थे। वहीं रतिके साथ कामदेव भी था। नारद! उस समय मैंने बड़ी प्रसन्नताके साथ दक्ष तथा दूसरे पुत्रोंको सम्बोधित करके वार्तालाप आरम्भ किया। उस वार्तालापके समय मैं शिवकी मायासे पूर्णतया मोहित था; अतः मैंने कहा—'पुत्रो! तुम्हें ऐसा प्रयत्न करना चाहिये, जिससे महादेवजी किसी कमनीय कान्तिवाली स्त्रीका पाणिग्रहण करें।' इसके बाद मैंने भगवान् शिवको मोहित करनेका भार रतिसहित कामदेवको सौंपा। कामदेवने मेरी आज्ञा मानकर कहा— 'प्रभो! सुन्दरी स्त्री ही मेरा अस्त्र है, अतः शिवजीको मोहित करनेके लिये किसी नारीकी सृष्टि कीजिये।' यह सुनकर मैं चिन्तामें पड़ गया और लंबी साँस खींचने लगा। मेरे उस निःश्वाससे राशि-राशि पुष्पोंसे विभूषित वसन्तका प्रादुर्भाव हुआ। वसन्त और मलयानल—ये दोनों मदनके सहायक हुए। इनके साथ जाकर कामदेवने वामदेवको मोहनेकी बारंबार चेष्टा की, परंतु उसे सफलता न मिली। जब वह निराश होकर लौट आया, तब उसकी बात सुनकर मुझे बड़ा दुःख हुआ। उस समय मेरे मुखसे जो निःश्वास वायु चली, उससे मारगणोंकी उत्पत्ति हुई। उन्हें मदनकी सहायताके लिये आदेश देकर मैंने पुनः उन सबको शिवजीके पास भेजा, परंतु महान् प्रयत्न करनेपर भी वे भगवान् शिवको मोहमें न डाल सके। काम सपरिवार लौट