भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 186

१७२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

ब्रह्माजीने कहा—नारद! तुम धन्य हो! इन सभी मुनियोंके साथ भक्तिपूर्वक इस प्रसंगको सुनो। मेरी आज्ञा पाकर उत्तम बुद्धिवाले महाप्रजापति दक्षने क्षीरसागरके उत्तर तटपर स्थित हो देवी जगदम्बिकाको पुत्रीके रूपमें प्राप्त करनेकी इच्छा तथा उनके प्रत्यक्ष दर्शनकी कामना लिये उन्हें हृदय-मन्दिरमें विराजमान करके तपस्या प्रारम्भ की। दक्षने मनको संयममें रखकर दृढ़तापूर्वक कठोर व्रतका पालन करते हुए शौच-संतोषादि नियमोंसे युक्त हो तीन हजार दिव्य वर्षोंतक तप किया। वे कभी जल पीकर रहते, कभी हवा पीते और कभी सर्वथा उपवास करते थे। भोजनके नामपर कभी सूखे पत्ते चबा लेते थे।

मुनिश्रेष्ठ नारद! तदनन्तर यम-नियमादिसे युक्त हो जगदम्बाकी पूजामें लगे हुए दक्षको देवी शिवाने प्रत्यक्ष दर्शन दिया। जगन्मयी जगदम्बाका प्रत्यक्ष दर्शन पाकर प्रजापति दक्षने अपने-आपको कृतकृत्य माना। वे कालिकादेवी सिंहपर आरूढ़ थीं। उनकी अंगकान्ति श्याम थी। मुख बड़ा ही मनोहर था। वे चार भुजाओंसे युक्त थीं और हाथोंमें वरद, अभय, नील कमल और खड्ग धारण किये हुए थीं। उनकी मूर्ति बड़ी मनोहारिणी थी। नेत्र कुछ-कुछ लाल थे। खुले हुए केश बड़े सुन्दर दिखायी देते थे। उत्तम प्रभासे प्रकाशित होनेवाली उन जगदम्बाको भलीभाँति प्रणाम करके दक्ष विचित्र वचनावलियोंद्वारा उनकी स्तुति करने लगे।

दक्षने कहा—जगदम्ब! महामाये! जगदीशे! महेश्वरि! आपको नमस्कार है। आपने कृपा करके मुझे अपने स्वरूपका दर्शन कराया है। भगवति! आद्ये! मुझपर प्रसन्न होइये। शिवरूपिणि! प्रसन्न होइये। भक्तवरदायिनि! प्रसन्न होइये। जगन्माये! आपको मेरा नमस्कार है।*

ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! संयत चित्तवाले दक्षके इस प्रकार स्तुति करनेपर महेश्वरी शिवाने स्वयं ही उनके अभिप्रायको जान लिया तो भी दक्षसे इस प्रकार कहा—'दक्ष! तुम्हारी इस उत्तम भक्तिसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ। तुम अपना मनोवांछित वर माँगो। तुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है।'


* प्रसीद भगवत्याद्ये प्रसीद शिवरूपिणि। प्रसीद भक्तवरदे जगन्माये नमोऽस्तु ते॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० १२।१४)