भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 850 में से

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पृष्ठ 187

* रुद्रसंहिता * १७३

जगदम्बाकी यह बात सुनकर प्रजापति दक्ष बहुत प्रसन्न हुए और उन शिवाको बारंबार प्रणाम करते हुए बोले।

दक्षने कहा—जगदम्ब! महामाये! यदि आप मुझे वर देनेके लिये उद्यत हैं तो मेरी बात सुनिये और प्रसन्नतापूर्वक मेरी इच्छा पूर्ण कीजिये। मेरे स्वामी जो भगवान् शिव हैं, वे रुद्रनाम धारण करके ब्रह्माजीके पुत्ररूपसे अवतीर्ण हुए हैं। वे परमात्मा शिवके पूर्णावतार हैं। परंतु आपका कोई अवतार नहीं हुआ। फिर उनकी पत्नी कौन होगी ? अतः शिवे! आप भूतलपर अवतीर्ण होकर उन महेश्वरको अपने रूप-लावण्यसे मोहित कीजिये। देवि! आपके सिवा दूसरी कोई स्त्री रुद्रदेवको कभी मोहित नहीं कर सकती। इसलिये आप मेरी पुत्री होकर इस समय महादेवजीकी पत्नी होइये। इस प्रकार सुन्दर लीला करके आप हरमोहिनी (भगवान् शिवको मोहित करनेवाली) बनिये। देवि! यही मेरे लिये वर है। यह केवल मेरे ही स्वार्थकी बात हो, ऐसा नहीं सोचना चाहिये। इसमें मेरे ही साथ सम्पूर्ण जगत्‌का भी हित है। ब्रह्मा, विष्णु और शिवमेंसे ब्रह्माजीकी प्रेरणासे मैं यहाँ आया हूँ।

प्रजापति दक्षका यह वचन सुनकर जगदम्बिका शिवा हँस पड़ीं और मन ही-मन भगवान् शिवका स्मरण करके यों बोलीं।

देवीने कहा—तात! प्रजापते! दक्ष! मेरी उत्तम बात सुनो। मैं सत्य कहती हूँ, तुम्हारी भक्तिसे अत्यन्त प्रसन्न हो तुम्हें सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तु देनेके लिये उद्यत हूँ। दक्ष! यद्यपि मैं महेश्वरी हूँ, तथापि तुम्हारी भक्तिके अधीन हो तुम्हारी पत्नीके गर्भसे तुम्हारी पुत्रीके रूपमें अवतीर्ण होऊँगी— इसमें संशय नहीं है। अनघ! मैं अत्यन्त दुस्सह तपस्या करके ऐसा प्रयत्न करूँगी जिससे महादेवजीका वर पाकर उनकी पत्नी हो जाऊँ। इसके सिवा और किसी उपायसे कार्य सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि वे भगवान् सदाशिव सर्वथा निर्विकार हैं, ब्रह्मा और विष्णुके भी सेव्य हैं तथा नित्य परिपूर्णरूप ही हैं। मैं सदा उनकी दासी और प्रिया हूँ। प्रत्येक जन्ममें वे नानारूपधारी शम्भु ही मेरे स्वामी होते हैं। भगवान् सदाशिव अपने दिये हुए वरके प्रभावसे ब्रह्माजीकी भृकुटिसे रुद्ररूपमें अवतीर्ण हुए हैं। मैं भी उनके वरसे उनकी आज्ञाके अनुसार यहाँ अवतार लूँगी। तात! अब तुम अपने घरको जाओ। इस कार्यमें जो मेरी दूती अथवा सहायिका होगी, उसे मैंने जान लिया है। अब शीघ्र ही मैं तुम्हारी पुत्री होकर महादेवजीकी पत्नी बनूँगी।

दक्षसे यह उत्तम वचन कहकर मन-ही-मन शिवकी आज्ञा प्राप्त करके देवी शिवाने शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हुए फिर कहा—'प्रजापते! परंतु मेरा एक प्रण है, उसे तुम्हें सदा मनमें रखना चाहिये। मैं उस प्रणको सुना देती हूँ। तुम उसे सत्य समझो, मिथ्या न मानो। यदि कभी मेरे प्रति तुम्हारा आदर घट जायगा, तब उसी समय मैं अपने शरीरको त्याग दूँगी, अपने स्वरूपमें लीन हो जाऊँगी अथवा दूसरा शरीर धारण कर लूँगी। मेरा यह कथन सत्य है। प्रजापते! प्रत्येक सर्ग या कल्पके लिये तुम्हें यह वर दे दिया गया—मैं तुम्हारी पुत्री होकर भगवान्

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