शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- रुद्रसंहिता * १८७
सर्वेश्वर महाप्रभु महादेवजीसे ऐसा कहकर मैं अत्यन्त वेगशाली रथके द्वारा दक्षके घर जा पहुँचा।
नारदजीने पूछा—वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाभाग! विधातः! बताइये—जब सती घरपर लौटकर आयीं, तब दक्षने उनके लिये क्या किया?
ब्रह्माजीने कहा—तपस्या करके मनोवांछित वर पाकर सती जब घरको लौट गयीं, तब वहाँ उन्होंने माता-पिताको प्रणाम किया। सतीने अपनी सखीके द्वारा माता-पिताको तपस्या-सम्बन्धी सब समाचार कहलवाया। सखीने यह भी सूचित किया कि 'सतीको महेश्वरसे वरकी प्राप्ति हुई है, वे सतीकी भक्तिसे बहुत संतुष्ट हुए हैं।' सखीके मुँहसे सारा वृत्तान्त सुनकर माता-पिताको बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ और उन्होंने महान् उत्सव किया। उदारचेता दक्ष और महामनस्विनी वीरिणीने ब्राह्मणोंको उनकी इच्छाके अनुसार द्रव्य दिया तथा अन्यान्य अंधों और दीनोंको भी धन बाँटा।
प्रसन्नता बढ़ानेवाली अपनी पुत्रीको हृदयसे लगाकर माता वीरिणीने उसका मस्तक सूँघा और आनन्दमग्न होकर उसकी बारंबार प्रशंसा की। तदनन्तर कुछ काल व्यतीत होनेपर धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ दक्ष इस चिन्तामें पड़े कि 'मैं अपनी इस पुत्रीका विवाह भगवान् शंकरके साथ किस तरह करूँ? महादेवजी प्रसन्न होकर आये थे, पर वे तो चले गये। अब मेरी पुत्रीके लिये वे फिर कैसे यहाँ आयेंगे? यदि किसीको शीघ्र ही भगवान् शिवके निकट भेजा जाय तो यह भी उचित नहीं जान पड़ता; क्योंकि यदि वे इस तरह अनुरोध करनेपर भी मेरी पुत्रीको ग्रहण न करें तो मेरी याचना निष्फल हो जायगी।'
इस प्रकारकी चिन्तामें पड़े हुए प्रजापति दक्षके सामने मैं सरस्वतीके साथ सहसा उपस्थित हुआ। मुझ पिताको आया देख दक्ष प्रणाम करके विनीतभावसे खड़े हो गये। उन्होंने मुझ स्वयंभूको यथायोग्य आसन दिया। तदनन्तर दक्षने जब मेरे आनेका कारण पूछा, तब मैंने सब बातें बताकर उनसे कहा—'प्रजापते! भगवान् शंकरने तुम्हारी पुत्रीको प्राप्त करनेके लिये निश्चय ही मुझे तुम्हारे पास भेजा है; इस विषयमें जो श्रेष्ठ कृत्य हो, उसका निश्चय करो। जैसे सतीने नाना प्रकारके भावोंसे तथा सात्त्विक व्रतके द्वारा भगवान् शिवकी आराधना की है, उसी तरह वे भी सतीकी आराधना करते हैं। इसलिये दक्ष! भगवान् शिवके लिये ही संकल्पित एवं प्रकट हुई अपनी इस पुत्रीको तुम अविलम्ब उनकी