भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१८८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

सेवामें सौंप दो, इससे तुम कृतकृत्य हो जाओगे। मैं नारदके साथ जाकर उन्हें तुम्हारे घर ले आऊँगा। फिर तुम उन्हींके लिये उत्पन्न हुई अपनी यह पुत्री उनके हाथमें दे दो।'

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! मेरी यह बात सुनकर मेरे पुत्र दक्षको बड़ा हर्ष हुआ। वे अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले—'पिताजी! ऐसा ही होगा।' मुने ! तब मैं अत्यन्त हर्षित हो वहाँसे उस स्थानको लौटा, जहाँ लोक-कल्याणमें तत्पर रहनेवाले भगवान् शिव बड़ी उत्सुकतासे मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। नारद ! मेरे लौट आनेपर स्त्री और पुत्रीसहित प्रजापति दक्ष भी पूर्णकाम हो गये। वे इतने संतुष्ट हुए, मानो अमृत पीकर अघा गये हों।

(अध्याय १७)


ब्रह्माजीसे दक्षकी अनुमति पाकर देवताओं और मुनियोंसहित भगवान् शिवका दक्षके घर जाना, दक्षद्वारा सबका सत्कार तथा सती और शिवका विवाह

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! तदनन्तर मैं हिमालयके कैलास-शिखरपर रहनेवाले परमेश्वर महादेव शिवको लानेके लिये प्रसन्नतापूर्वक उनके पास गया और उनसे इस प्रकार बोला—'वृषभध्वज ! सतीके लिये मेरे पुत्र दक्षने जो बात कही है, उसे सुनिये और जिस कार्यको वे अपने लिये असाध्य मानते थे, उसे सिद्ध हुआ ही समझिये। दक्षने कहा है कि 'मैं अपनी पुत्री भगवान् शिवके ही हाथमें दूँगा; क्योंकि उन्हींके लिये यह उत्पन्न हुई है। शिवके साथ सतीका विवाह हो यह कार्य तो मुझे स्वतः ही अभीष्ट है; फिर आपके भी कहनेसे इसका महत्त्व और अधिक बढ़ गया। मेरी पुत्रीने स्वयं इसी उद्देश्यसे भगवान् शिवकी आराधना की है और इस समय शिवजी भी मुझसे इसीके विषयमें अन्वेषण (पूछताछ) कर रहे हैं; इसलिये मुझे अपनी कन्या अवश्य ही भगवान् शिवके हाथमें देनी है। विधातः! वे भगवान् शंकर शुभ लग्न और शुभ मुहूर्तमें यहाँ पधारें। उस समय मैं उन्हें शिक्षाके तौरपर अपनी यह पुत्री दे दूँगा।' वृषभध्वज! मुझसे दक्षने ऐसी बात कही है। अतः आप शुभ मुहूर्तमें उनके घर चलिये और सतीको ले आइये।'

मुने! मेरी यह बात सुनकर भक्त-वत्सल रुद्र लौकिक गतिका आश्रय ले