भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 203

* रुद्रसंहिता * १८९

हँसते हुए मुझसे बोले—‘संसारकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्माजी! मैं तुम्हारे और नारदके साथ ही दक्षके घर चलूँगा! अतः नारदका स्मरण करो। अपने मरीचि आदि मानसपुत्रोंको भी बुला लो। विधे! मैं उन सबके साथ दक्षके निवासस्थानपर चलूँगा। मेरे पार्षद भी मेरे साथ रहेंगे।’

नारद! लोकाचारके निर्वाहमें लगे हुए भगवान् शिवके इस प्रकार आज्ञा देनेपर मैंने तुम्हारा और मरीचि आदि पुत्रोंका भी स्मरण किया। मेरे याद करते ही तुम्हारे साथ मेरे सभी मानस-पुत्र मनमें आदरकी भावना लिये शीघ्र ही वहाँ आ पहुँचे। उस समय तुम सब लोग हर्षसे उत्फुल्ल हो रहे थे। फिर रुद्रके स्मरण करनेपर शिवभक्तोंके सम्राट् भगवान् विष्णु भी अपने सैनिकों तथा कमलादेवीके साथ गरुड़पर आरूढ़ हो तुरंत वहाँ आ गये। तदनन्तर चैत्रमासके शुक्लपक्षकी त्रयोदशी तिथिमें रविवारको पूर्वा-फाल्गुनी नक्षत्रमें मुझ ब्रह्मा और विष्णु आदि समस्त देवताओंके साथ महेश्वरने विवाहके लिये यात्रा की। मार्गमें उन देवताओं और ऋषियोंके साथ यात्रा करते हुए भगवान् शंकर बड़ी शोभा पा रहे थे। वहाँ जाते हुए देवताओं, मुनियों तथा आनन्दमग्न मनवाले प्रमथगणोंका रास्तेमें बड़ा उत्सव हो रहा था। भगवान् शिवकी इच्छासे वृषभ, व्याघ्र, सर्प, जटा और चन्द्रकला आदि सब-के-सब उनके लिये यथायोग्य आभूषण बन गये। तदनन्तर वेगसे चलनेवाले बलवान् बलीवर्द नन्दिकेश्वरपर आरूढ़ हुए महादेवजी श्रीविष्णु आदि देवताओंको साथ लिये क्षणभरमें प्रसन्नतापूर्वक दक्षके घर जा पहुँचे।

वहाँ विनीतचित्तवाले प्रजापति दक्ष समस्त आत्मीय जनोंके साथ भगवान् शिवकी अगवानीके लिये उनके सामने आये। उस समय उनके समस्त अंगोंमें हर्षजनित रोमांच हो आया था। स्वयं दक्षने अपने द्वारपर आये हुए समस्त देवताओंका सत्कार किया। वे सब लोग सुरश्रेष्ठ शिवको बिठाकर उनके पार्श्वभागमें स्वयं भी मुनियोंके साथ क्रमशः बैठ गये। इसके बाद दक्षने मुनियोंसहित समस्त देवताओंकी परिक्रमा की और उन सबके साथ भगवान् शिवको घरके भीतर ले आये। उस समय दक्षके मनमें बड़ी प्रसन्नता थी। उन्होंने सर्वेश्वर शिवको उत्तम आसन देकर स्वयं ही विधिपूर्वक उनका पूजन किया। तत्पश्चात् श्रीविष्णुका, मेरा, ब्राह्मणोंका, देवताओंका और समस्त शिवगणोंका भी यथोचित विधिसे उत्तम भक्तिभावके साथ पूजन किया। इस तरह पूजनीय पुरुषों तथा अन्य लोगोंसहित उन सबका यथोचित आदर-सत्कार करके दक्षने मेरे मानस-पुत्र मरीचि आदि मुनियोंके साथ आवश्यक सलाह की। इसके बाद मेरे पुत्र दक्षने मुझ पितासे मेरे चरणोंमें प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक कहा—‘प्रभो! आप ही वैवाहिक कार्य करायें।’

तब मैं भी हर्षभरे हृदयसे ‘बहुत अच्छा’ कहकर उठा और वह सारा कार्य कराने लगा। तदनन्तर ग्रहोंके बलसे युक्त शुभ लग्न और मुहूर्तमें दक्षने हर्षपूर्वक अपनी पुत्री सतीका हाथ भगवान् शंकरके हाथमें दे दिया। उस समय हर्षसे भरे हुए भगवान् वृषभध्वजने भी वैवाहिक विधिसे सुन्दरी दक्षकन्याका पाणिग्रहण किया। फिर मैंने, श्रीहरिने, तुम तथा अन्य मुनियोंने, देवताओं