शिव पुराण

शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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चित्र-सूची
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| रेखा-चित्र | गणोंको शाप देना ...................................... | ११३ | |
| १- लिंगस्थित भगवान् शिव.... | मुखपृष्ठ | १५- नारदजीका मायाके दूर हो जानेपर पश्चात्ताप-पूर्वक भगवान् विष्णुके चरणोंमें गिरकर अपनी शुद्धिका उपाय पूछना... | ११४ |
| २- शौनकजीको सूतजीका शिवपुराणकी उत्कृष्ट महिमा सुनाना... | २१ | १६- नारदजीका ब्रह्मलोकमें जाकर ब्रह्माजीको भक्तिपूर्वक नमस्कार करना और अनेक प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करके उनसे शिवतत्त्वके विषयमें पूछना .......................... | ११७ |
| ३- यमपुरीमें गये देवराज ब्राह्मणको विमानपर बिठाकर शिवदूतोंका कैलास जानेके लिये उद्यत होना तथा धर्मराजका अपने भवनसे बाहर निकलकर उन सबकी पूजा एवं प्रार्थना करना... | २३ | १७- सदाशिवद्वारा स्वरूपभूता शक्ति (अम्बिका)-का प्रकटीकरण... | ११९ |
| ४- वाष्कलनगर-निवासिनी चंचुलाका गोकर्णक्षेत्रमें शिवकथा बाँचनेवाले एक पौराणिक ब्राह्मणसे अपना उद्धार करनेकी बात करना... | २५ | १८- अविमुक्तक्षेत्र (काशी)—आनन्दवनमें पार्वतीके साथ विचरण करते हुए भगवान् शिवके द्वारा अपने वामभागके दसवें अंगसे विष्णुको प्रकट करना... | १२१ |
| ५- चंचुलाका शिवपुराण सुननेके परिणामस्वरूप शिवद्वारा भेजे गये विमानपर आरूढ़ होकर शिवलोकमें आगमन तथा पार्वतीका उसे अपनी सखी स्वीकार करना... | २८ | १९- शिवका ब्रह्माका हाथ पकड़कर विष्णुको उन्हें सौंपकर संकटके समय सदा उनकी सहायता करते रहनेके लिये कहना... | १३० |
| ६- पार्वतीदेवीका चंचुलाके साथ जाकर उसके पति पिशाचयोनिवाले बिन्दुगको शिवपुराणकी कथा सुनानेका गन्धर्वराज तुम्बुरुको आदेश ... | ३० | २०- ब्रह्माजीका ऋषियों और देवताओंके साथ क्षीरसागरके तटपर विष्णुके पास आगमन... .. | १३६ |
| ७- चंचुलाके साथ विंध्यपर्वतपर जाकर गन्धर्वराज तुम्बुरुका बिन्दुग पिशाचको पाशोंद्वारा बाँधना तथा हाथमें वीणा लेकर गौरी-पतिकी कथाका गान आरम्भ करना... | ३१ | २१- कैलासके शिखरपर निवास करनेवाले साम्ब शिवका ध्यान करनेयोग्य पंचमुख-रूप... ... | १४२ |
| ८- सरस्वती नदीके तटपर तपस्यारत व्यासदेवको सनत्कुमारका सत्यवस्तु—भगवान् शिवके चिन्तनका आदेश देना... | ४१ | २२- ब्रह्माद्वारा घोर एवं उत्कृष्ट तप करनेपर उनकी दोनों भौंहों और नासिकाके मध्यभागसे शिवका अर्धनारीश्वररूपमें प्राकट्य... | १४८ |
| ९- महेश्वरका ब्रह्मा और विष्णुको अपने निष्कल और सकल स्वरूपका परिचय देना तथा दोनोंके मध्यमें भीषण अग्निस्तम्भके रूपमें उनका आविर्भाव... | ४४ | २३- ब्रह्माद्वारा प्रार्थना करनेपर शिवका अपने ही समान बहुत-से रुद्रगणोंकी सृष्टि करना... ... | १४९ |
| १०- हिमालयपर्वतकी एक गुफामें नारदजीकी तपस्या......................................................... | १०६ | २४- ब्रह्माका अपने शरीरको दो भागोंमें विभक्त कर दो रूपवाला हो जाना तथा एकसे मनु और दूसरेसे शतरूपाको उत्पन्न करना... ...... | १५० |
| ११- नारदजीका अपनी काम-विजयका वृत्तान्त विष्णुसे कहनेके लिये विष्णुलोकमें आगमन... | १०८ | २५- काम्पिल्य-नगरमें निवास करनेवाले यज्ञदत्त ब्राह्मणके दुराचारी पुत्र गुणनिधिका शिवमन्दिरमें नैवेद्य चुरानेकी इच्छासे प्रवेश... | १५२ |
| १२- विष्णुद्वारा मायानिर्मित नगरमें राजा शीलनिधिका नारदको रत्नसिंहासनपर बिठाकर उनका पूजन करना तथा अपनी कन्या श्रीमतीको उन्हें प्रणाम करनेका आदेश देना..... | ११० | २६- कलिंगराज दमका ग्रामाध्यक्षोंको बुलाकर अपने-अपने गाँवोंके शिवालयोंमें सदा दीप जलानेका आदेश देना... | १५२ |
| १३- राजपुत्रोंसे समलंकृत राजा शीलनिधिकी स्वयंवरसभामें बैठे हुए कुरूप मुखवाले नारदजीकी ओर देखकर ब्राह्मण-वेषमें आकर बैठे हुए दो रुद्र-पार्षदोंका हँसी उड़ाना... | ११२ | २७- ब्रह्माजीसे समस्त शुभ-शिव-चरित्र सुनानेके लिये नारदकी प्रार्थना... ............................. | १५७ |
| १४- नारदका दर्पणमें अपना वानरके समान मुख देखना और उपहास करनेवाले दोनों रुद्र- | २८- ब्रह्माके हृदयसे मनोहर रूपवाली सुन्दरी नारी संध्याका उत्पन्न होना... .................... | १५७ | |
| २९- मरीचि आदि ऋषियोंद्वारा मनोभव कामदेवके मदन, मन्मथ, दर्पक, कंदर्प आदि अनेक नाम रखना... ............................................. | १५९ | ||
| ३०- दक्षका अपने ही शरीरसे प्रकट हुई ‘रति’ नामकी कन्याको कंदर्पको संकल्पपूर्वक सौंपना... | १६० |