शिव पुराण

शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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( १६ )
| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| ३१- ब्रह्माकी प्रेरणासे वसिष्ठका एक तेजस्वी ब्रह्मचारीके रूपमें चन्द्रभाग पर्वतपर तपस्या करनेवाली संध्याके पास जाकर उसके निर्जन पर्वतपर आनेका प्रयोजन पूछना तथा तपस्या करनेकी विधि बताना... | १६१ |
| ३२- तपस्यामें लीन संध्याको शिवका उसीके आराध्यरूपमें प्रत्यक्ष दर्शन देना... | १६३ |
| ३३- संध्याद्वारा मेधातिथि मुनिके यज्ञकी अग्निमें आत्माहुति तथा उसके पुरोडाशमय शरीरके तत्काल दग्ध होनेपर यज्ञकी समाप्तिके समय अग्निकी ज्वालामें महर्षि मेधातिथिका तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाली पुत्रीके रूपमें उसे प्राप्त करना... | १६८ |
| ३४- महाप्रजापति दक्षकी तपस्यासे प्रसन्न होकर सिंहवाहिनी जगदम्बाका चतुर्भुजरूपमें उन्हें दर्शन देना... | १७२ |
| ३५- नारदकी ही शिक्षासे अपने हर्यश्व तथा शबलाश्व आदि पुत्रोंके ऊर्ध्वगामी होनेपर दक्ष प्रजापतिका कष्टका अनुभव करना तथा दैववश अनुग्रह करनेके लिये आये हुए नारदको उनका क्रोधपूर्वक धिक्कारना... | १७६ |
| ३६- अपनी पत्नी वीरिणीसहित प्रजापति दक्षद्वारा जगदम्बाका ध्यान और प्रेमपूर्वक स्तवन करना... | १७७ |
| ३७- सब देवताओंके साथ ब्रह्मा और विष्णु आदिका गिरिश्रेष्ठ कैलासपर महादेवके पास आगमन... | १८० |
| ३८- सतीका तपस्या करके मनोवांछित वर पानेपर घर लौटकर माता (वीरिणी) और पिता (प्रजापति दक्ष)-को प्रणाम करना तथा अपनी सखीद्वारा उनको अपनी तपस्यासम्बन्धी सब समाचार कहलवाना... | १८७ |
| ३९- ब्रह्मा, विष्णु, नारद, देवताओं और मुनियों आदिके साथ शिवकी दक्षके घरके लिये विवाहयात्रा... | १८८ |
| ४०- विवाहकृत्य सकुशल समाप्त हो जानेपर दक्षकी आज्ञासे शिवका प्रसन्नतापूर्वक सतीको वृषभकी पीठपर बिठाकर विष्णु आदि देवताओं और मुनियों आदिके साथ हिमालयपर्वतकी ओर प्रस्थान करना... | १९१ |
| ४१- शिवका अपने स्वरूपका ध्यान तोड़ना जानकर जगदम्बा सतीका कैलासपर आना तथा उदारचेता शम्भुद्वारा उन्हें अपने सामने बैठनेके लिये आसन देना... | २०२ |
| ४२- दक्षद्वारा यज्ञमें रुद्रगणोंको शाप दिया जाना तथा शिवके प्रियभक्त नन्दीका दक्षको प्रत्युत्तर... | २०४ |
| ४३- ब्राह्मणकुल और वेदोंको शाप देनेवाले नन्दीको शिवका समझाना... | २०५ |
| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| ४४- वृषभपर सवार होकर बहुसंख्यक प्रमथगणोंके साथ सतीका अपने पिता दक्षके यज्ञकी ओर प्रस्थान... | २११ |
| ४५- दक्षके यज्ञमें उपस्थित सतीके शरीरका योगाग्निसे जलकर उसी क्षण भस्म हो जाना, शिवके पार्षदोंका दक्षका प्राण लेनेके लिये आक्रमण तथा भृगुद्वारा यज्ञमें विघ्न डालनेवालोंके नाशके लिये यज्ञकुण्डसे ऋभु नामक सहस्रों देवताओंको प्रकट करना और शिवके प्रमथ-गणोंका भाग खड़ा होना... | २१५ |
| ४६- नारदके मुखसे दक्षयज्ञमें सतीके योगाग्निमें भस्म होने और असंख्य प्रमथगणोंके विनष्ट हो जानेका समाचार सुनकर शिवद्वारा क्रोधपूर्वक सिरसे एक जटा उखाड़कर पर्वतपर पटकना तथा जटाके दो भाग होनेपर पूर्वभागसे वीरभद्र और दूसरे भागसे महाकालीका उत्पन्न होना... | २१९ |
| ४७- दक्षका भगवान् विष्णुकी शरणमें जाकर उनके चरणोंमें गिरना तथा यज्ञका विनाश न होनेकी प्रार्थना करना... | २२३ |
| ४८- शुक्राचार्यके आदेशसे दधीचिद्वारा महा-मृत्युंजयका कठोर तपस्यापूर्वक जप तथा शिवका उनके सामने प्रत्यक्ष प्रकट होकर दर्शन देना, दधीचिद्वारा शिवकी स्तुति और वरकी याचना... | २३१ |
| ४९- ब्रह्मा, विष्णु और देवताओंके साथ शिवका कनखलमें स्थित दक्षकी यज्ञशालामें पधारना तथा वीरभद्रद्वारा विध्वंस किये गये यज्ञ-स्थलको देखना... | २३८ |
| ५०- देवताओंद्वारा स्तुति की जानेपर परम अद्भुत दिव्य रत्नमय रथपर विराजमान जगज्जननी देवी उमाका उनके सामने प्रकट होना... | २४७ |
| ५१- मनमें संतानकी कामना लेकर तप करनेवाली हिमवान्की पत्नी मेनाके सामने प्रसन्नतापूर्वक जगदम्बाका प्रकट होकर उनपर अनुग्रह करना... | २५० |
| ५२- गिरिराज हिमालयकी प्रार्थनापर नारदजीद्वारा उमाकी जन्मकुण्डलीपर विचार करनेके लिये उनका हाथ देखा जाना... | २५४ |
| ५३- अपनी कन्या उमाका विवाह किसी सुन्दर वरके साथ कर देनेके लिये मेनाका अपने पति हिमवान्के पास जाकर विनय करना तथा हिमवान्का उन्हें समझाना... | २५७ |
| ५४- शिवका गंगावतरणतीर्थमें जाकर आत्मभूत परमात्माका चिन्तन करना तथा सेवकोंसहित गिरिराज हिमवान्का आकर उन्हें स्तवनपूर्वक प्रणाम करना... | २६० |
| ५५- शिवका दर्शन करनेके लिये अपनी पुत्री उमाके साथ नित्य आनेकी हिमवान्का उनसे |