शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* रुद्रसंहिता * । १९७
विधातः! आप मुझे शिवा और शिवके भाव तथा आचारसे सम्बन्ध रखनेवाले उनके चरित्रको विस्तारपूर्वक सुनाइये। तात! भगवान् शंकरने अपने प्राणोंसे भी प्यारी धर्मपत्नी सतीका किसलिये त्याग किया? यह घटना तो मुझे बड़ी विचित्र जान पड़ती है। अतः इसे आप अवश्य कहें। अज! आपके पुत्र दक्षके यज्ञमें भगवान् शिवका अनादर कैसे हुआ? और वहाँ पिताके यज्ञमें जाकर सतीने अपने शरीरका त्याग किस प्रकार किया? उसके बाद वहाँ क्या हुआ? भगवान् महेश्वरने क्या किया? ये सब बातें मुझसे कहिये। इन्हें सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी श्रद्धा है।
ब्रह्माजीने कहा—मेरे पुत्रोंमें श्रेष्ठ! महाप्राज्ञ! तात नारद! तुम महर्षियोंके साथ बड़े प्रेमसे भगवान् चन्द्रमौलिका यह चरित्र सुनो। श्रीविष्णु आदि देवताओंसे सेवित परब्रह्म महेश्वरको नमस्कार करके मैं उनके महान् अद्भुत चरित्रका वर्णन आरम्भ करता हूँ। मुने! यह सब भगवान् शिवकी लीला ही है। वे प्रभु अनेक प्रकारकी लीला करनेवाले, स्वतन्त्र और निर्विकार हैं। देवी सती भी वैसी ही हैं। अन्यथा वैसा कर्म करनेमें कौन समर्थ हो सकता है। परमेश्वर शिव ही परब्रह्म परमात्मा हैं।
एक समयकी बात है, तीनों लोकोंमें विचरनेवाले लीलाविशारद भगवान् रुद्र सतीके साथ बैलपर आरूढ़ हो इस भूतलपर भ्रमण कर रहे थे। घूमते-घूमते वे दण्डकारण्यमें आये। वहाँ उन्होंने लक्ष्मणसहित भगवान् श्रीरामको देखा, जो रावणद्वारा छलपूर्वक हरी गयी अपनी प्यारी पत्नी सीताकी खोज कर रहे थे। वे 'हा सीते!' ऐसा उच्चस्वरसे पुकारते, जहाँ-तहाँ देखते और बारंबार रोते थे। उनके मनमें विरहका आवेश छा गया था। सूर्यवंशमें उत्पन्न, वीर भूपाल, दशरथनन्दन, भरताग्रज श्रीराम आनन्दरहित हो लक्ष्मणके साथ वनमें भ्रमण कर रहे थे और उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी। उस समय उदारचेता पूर्णकाम भगवान् शंकरने बड़ी प्रसन्नताके साथ उन्हें प्रणाम किया और जय-जयकार करके वे दूसरी ओर चल दिये। भक्तवत्सल शंकरने उस वनमें श्रीरामके सामने अपनेको प्रकट नहीं किया। भगवान् शिवकी मोहमें डालनेवाली ऐसी लीला देख सतीको बड़ा विस्मय हुआ। वे उनकी मायासे मोहित हो उनसे इस प्रकार बोलीं।
सतीने कहा—देवदेव सर्वेश! परब्रह्म परमेश्वर! ब्रह्मा, विष्णु आदि सब देवता आपकी ही सदा सेवा करते हैं। आप ही सबके द्वारा प्रणाम करनेयोग्य हैं। सबको आपका ही सर्वदा सेवन और ध्यान करना चाहिये। वेदान्त-शास्त्रके द्वारा यत्नपूर्वक जाननेयोग्य निर्विकार परमप्रभु आप ही हैं। नाथ! ये दोनों पुरुष कौन हैं; इनकी आकृति विरहव्यथासे व्याकुल दिखायी देती है। ये दोनों धनुर्धर वीर वनमें विचरते हुए क्लेशके भागी और दीन हो रहे हैं। इनमें जो ज्येष्ठ है, उसकी अंगकान्ति नीलकमलके समान श्याम है। उसे देखकर किस कारणसे आप आनन्दविभोर हो उठे थे? आपका चित्त क्यों अत्यन्त प्रसन्न हो गया था? आप इस समय भक्तके समान विनम्र क्यों हो गये थे? स्वामिन्! कल्याणकारी शिव! आप मेरे संशयको सुनें। प्रभो! सेव्य स्वामी अपने सेवकको प्रणाम करे, यह उचित नहीं जान पड़ता।