शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद ! कल्याणमयी परमेश्वरी आदिशक्ति सती देवीने शिवकी मायाके वशीभूत होकर जब भगवान् शिवसे इस प्रकार प्रश्न किया, तब सतीकी वह बात सुनकर लीलाविशारद परमेश्वर शंकर हँसकर उनसे इस प्रकार बोले।
परमेश्वरने कहा—देवि ! सुनो, मैं प्रसन्नतापूर्वक यथार्थ बात कहता हूँ। इसमें छल नहीं है। वरदानके प्रभावसे ही मैंने इन्हें आदरपूर्वक प्रणाम किया है। प्रिये ! ये दोनों भाई वीरोंद्वारा सम्मानित हैं। इनके नाम हैं—श्रीराम और लक्ष्मण। इनका प्राकट्य सूर्यवंशमें हुआ है। ये दोनों राजा दशरथके विद्वान् पुत्र हैं। इनमें जो गोरे रंगके छोटे बन्धु हैं, वे साक्षात् शेषके अंश हैं। उनका नाम लक्ष्मण है। इनके बड़े भैयाका नाम श्रीराम है। इनके रूपमें भगवान् विष्णु ही अपने सम्पूर्ण अंशसे प्रकट हुए हैं। उपद्रव इनसे दूर ही रहते हैं। ये साधुपुरुषोंकी रक्षा और हमलोगोंके कल्याणके लिये इस पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए हैं!
ऐसा कहकर सृष्टिकर्ता भगवान् शम्भु चुप हो गये। भगवान् शिवकी ऐसी बात सुनकर भी सतीके मनको इसपर विश्वास नहीं हुआ। क्यों न हो, भगवान् शिवकी माया बड़ी प्रबल है, वह सम्पूर्ण त्रिलोकीको मोहमें डाल देनेवाली है। सतीके मनमें मेरी बातपर विश्वास नहीं है, यह जानकर लीलाविशारद प्रभु सनातन शम्भु यों बोले।
शिवने कहा—देवि ! मेरी बात सुनो। यदि तुम्हारे मनमें मेरे कथनपर विश्वास नहीं है तो तुम वहाँ जाकर अपनी ही बुद्धिसे श्रीरामकी परीक्षा कर लो। प्यारी सती ! जिस प्रकार तुम्हारा मोह या भ्रम नष्ट हो जाय, वह करो। तुम वहाँ जाकर परीक्षा करो। तबतक मैं इस बरगदके नीचे खड़ा हूँ।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद ! भगवान् शिवकी आज्ञासे ईश्वरी सती वहाँ गयीं और मन-ही-मन यह सोचने लगीं कि 'मैं वनचारी रामकी कैसे परीक्षा करूँ, अच्छा, मैं सीताका रूप धारण करके रामके पास चलूँ। यदि राम साक्षात् विष्णु हैं, तब तो सब कुछ जान लेंगे; अन्यथा वे मुझे नहीं पहचानेंगे।' ऐसा विचार सती सीता बनकर श्रीरामके समीप उनकी परीक्षा लेनेके लिये गयीं। वास्तवमें वे मोहमें पड़ गयी थीं। सतीको सीताके रूपमें सामने आयी देख शिव-शिवका जप करते हुए रघुकुलनन्दन श्रीराम सब कुछ जान गये और हँसते हुए उन्हें नमस्कार करके बोले।
श्रीरामने पूछा—सतीजी! आपको नमस्कार है। आप प्रेमपूर्वक बतायें, भगवान् शम्भु कहाँ गये हैं? आप पतिके बिना अकेली ही इस वनमें क्योंकर आयीं? देवि ! आपने अपना रूप त्यागकर किसलिये यह नूतन रूप धारण किया है? मुझपर कृपा करके इसका कारण बताइये।
श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात सुनकर सती उस समय आश्चर्यचकित हो गयीं। वे शिवजीकी कही हुई बातका स्मरण करके और उसे यथार्थ समझकर बहुत लज्जित हुईं। श्रीरामको साक्षात् विष्णु जान अपने रूपको प्रकट करके मन-ही-मन भगवान् शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन कर प्रसन्नचित्त हुई सती उनसे इस तरह बोलीं—'रघुनन्दन ! स्वतन्त्र परमेश्वर भगवान् शिव