शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 227, कुल 850 में से
संदर्भ में पढ़ें* रुद्रसंहिता * २१३
पास कैसे जाऊँगी। यदि शंकरजीके दर्शनकी इच्छासे वहाँ गयी और उन्होंने यहाँका समाचार पूछा तो मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगी ?' तदनन्तर तीनों लोकोंकी जननी सती रोषावेशसे युक्त हो लंबी साँस खींचती हुई अपने दुष्टहृदय पिता दक्षसे बोलीं।
सतीने कहा—जो महादेवजीकी निन्दा करता है अथवा जो उनकी होती हुई निन्दाको सुनता है, वे दोनों तबतक नरकमें पड़े रहते हैं, जबतक चन्द्रमा और सूर्य विद्यमान हैं।* अतः तात ! मैं अपने इस शरीरको त्याग दूँगी, जलती आगमें प्रवेश कर जाऊँगी। अपने स्वामीका अनादर सुनकर अब मुझे अपने इस जीवनकी रक्षासे क्या प्रयोजन। यदि कोई समर्थ हो तो वह स्वयं विशेष यत्न करके शम्भुकी निन्दा करनेवाले पुरुषकी जीभको बलपूर्वक काट डाले। तभी वह शिव-निन्दा-श्रवणके पापसे शुद्ध हो सकता है, इसमें संशय नहीं है। यदि कुछ कर सकनेमें असमर्थ हो तो बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह दोनों कान बंद करके वहाँसे निकल जाय। इससे वह शुद्ध रहता है—दोषका भागी नहीं होता। ऐसा श्रेष्ठ विद्वान् कहते हैं।
इस प्रकार धर्मनीति बतानेपर सतीको अपने आनेके कारण बड़ा पश्चात्ताप हुआ। उन्होंने व्यथित चित्तसे भगवान् शंकरके वचनका स्मरण किया। फिर सती अत्यन्त कुपित हो दक्षसे, उन विष्णु आदि समस्त देवताओंसे तथा मुनियोंसे भी निडर होकर बोलीं।
सतीने कहा—तात ! तुम भगवान् शंकरके निन्दक हो। इसके लिये तुम्हें पश्चात्ताप होगा। यहाँ महान् दुःख भोगकर अन्तमें तुम्हें यातना भोगनी पड़ेगी। इस लोकमें जिनके लिये न कोई प्रिय है न अप्रिय, उन निर्वैर परमात्मा शिवके प्रतिकूल तुम्हारे सिवा दूसरा कौन चल सकता है। जो दुष्ट लोग हैं, वे सदा ईर्ष्यापूर्वक यदि महापुरुषोंकी निन्दा करें तो उनके लिये यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। परंतु जो महात्माओंके चरणोंकी रजसे अपने अज्ञानान्धकारको दूर कर चुके हैं, उन्हें महापुरुषोंकी निन्दा शोभा नहीं देती। जिनका 'शिव' यह दो अक्षरोंका नाम कभी बातचीतके प्रसंगसे मनुष्योंकी वाणीद्वारा एक बार भी उच्चारित हो जाय तो वह सम्पूर्ण पापराशिको शीघ्र ही नष्ट कर देता है, उन्हीं पवित्र कीर्तिवाले निर्मल शिवसे तुम द्वेष करते हो ? आश्चर्य है। वास्तवमें तुम अशिव (अमंगल)-रूप हो। महापुरुषोंके मनरूपी मधुकर ब्रह्मानन्दमय रसका पान करनेकी इच्छासे जिनके सर्वार्थदायक चरणकमलोंका निरन्तर सेवन किया करते हैं, उन्हींसे तुम मूर्खतावश द्रोह करते हो ? जिन्हें तुम नामसे शिव और कामसे अशिव बताते हो, उन्हें क्या तुम्हारे सिवा दूसरे विद्वान् नहीं जानते। ब्रह्मा आदि देवता, सनक आदि मुनि तथा अन्य ज्ञानी क्या उनके स्वरूपको नहीं समझते। उदारबुद्धि भगवान् शिव जटा फैलाये, कपाल धारण किये श्मशानमें भूतोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक रहते तथा भस्म
* यो निन्दति महादेवं निन्द्यमानं शृणोति वा। तावुभौ नरकं यातो यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० २९।३८)