शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
एवं नरमुण्डोंकी माला धारण करते हैं— इस बातको जानकर भी जो मुनि और देवता उनके चरणोंसे गिरे हुए निर्माल्यको बड़े आदरके साथ अपने मस्तकपर चढ़ाते हैं, इसका क्या कारण है? यही कि वे भगवान् शिव ही साक्षात् परमेश्वर हैं। प्रवृत्ति (यज्ञ-यागादि) और निवृत्ति—(शम-दम आदि)—दो प्रकारके कर्म बताये गये हैं। मनीषी पुरुषोंको उनका विचार करना चाहिये। वेदमें विवेचनपूर्वक उनके रागी और विरागी—दो प्रकारके अलग-अलग अधिकारी बताये गये हैं। परस्परविरोधी होनेके कारण उक्त दोनों प्रकारके कर्मोंका एक साथ एक ही कर्ताके द्वारा आचरण नहीं किया जा सकता। भगवान् शंकर तो परब्रह्म परमात्मा हैं, उनमें इन दोनों ही प्रकारके कर्मोंका प्रवेश नहीं है। उन्हें कोई कर्म प्राप्त नहीं होता, उन्हें किसी भी प्रकारके कर्म करनेकी आवश्यकता नहीं है। पिताजी! हमारा ऐश्वर्य अव्यक्त है। उसका कोई लक्षण व्यक्त नहीं है, सदा आत्मज्ञानी महापुरुष ही उसका सेवन करते हैं। तुम्हारे पास वह ऐश्वर्य नहीं है। यज्ञशालाओंमें रहकर वहाँके अन्नसे तृप्त होनेवाले कर्मठ लोगोंको जो भोग प्राप्त होता है, उससे वह ऐश्वर्य बहुत दूर है। जो महापुरुषोंकी निन्दा करनेवाला और दुष्ट है, उसके जन्मको धिक्कार है। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि उसके सम्बन्धको विशेषरूपसे प्रयत्न करके त्याग दे! जिस समय भगवान् शिव तुम्हारे साथ मेरा सम्बन्ध दिखलाते हुए मुझे दाक्षायणी कहकर पुकारेंगे, उस समय मेरा मन सहसा अत्यन्त दुःखी हो जायगा। इसलिये तुम्हारे अंगसे उत्पन्न हुए सदा शवके तुल्य घृणित इस शरीरको इस समय मैं निश्चय ही त्याग दूँगी और ऐसा करके सुखी हो जाऊँगी। हे देवताओ और मुनियो! तुम सब लोग मेरी बात सुनो। तुम्हारे हृदयमें दुष्टता आ गयी है। तुमलोगोंका यह कर्म सर्वथा अनुचित है। तुम सब लोग मूढ़ हो; क्योंकि शिवकी निन्दा और कलह तुम्हें प्रिय है। अतः भगवान् हरसे तुम्हें इस कुकर्मका निश्चय ही पूरा-पूरा दण्ड मिलेगा।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! उस यज्ञमें दक्ष तथा देवताओंसे ऐसा कहकर सतीदेवी चुप हो गयीं और मन-ही-मन अपने प्राणवल्लभ शम्भुका स्मरण करने लगीं।
(अध्याय २९)
सतीका योगाग्निसे अपने शरीरको भस्म कर देना, दर्शकोंका हाहाकार, शिवपार्षदोंका प्राणत्याग तथा दक्षपर आक्रमण, ऋभुओंद्वारा उनका भगाया जाना तथा देवताओंकी चिन्ता
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! मौन हुई सतीदेवी अपने पतिका सादर स्मरण करके शान्तचित्त हो सहसा उत्तरदिशामें भूमिपर बैठ गयीं। उन्होंने विधिपूर्वक जलका आचमन करके वस्त्र ओढ़ लिया और पवित्रभावसे आँखें मूँदकर पतिका चिन्तन करती हुईं वे योगमार्गमें स्थित हो गयीं। उन्होंने आसनको स्थिरकर प्राणायामद्वारा प्राण और अपानको एकरूप करके नाभि-चक्रमें स्थित किया। फिर उदान वायुको