भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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* रुद्रसंहिता * २१५

बलपूर्वक नाभिचक्रसे ऊपर उठाकर बुद्धिके साथ हृदयमें स्थापित किया। तत्पश्चात् शंकरकी प्राणवल्लभा अनिन्दिता सती उस हृदयस्थित वायुको कण्ठमार्गसे भृकुटियोंके बीचमें ले गयीं। इस प्रकार दक्षपर कुपित हो सहसा अपने शरीरको त्यागनेकी इच्छासे सतीने अपने सम्पूर्ण अंगोंमें योगमार्गके अनुसार वायु और अग्निकी धारणा की। तदनन्तर अपने पतिके चरणारविन्दोंका चिन्तन करती हुई सतीने अन्य सब वस्तुओंका ध्यान भुला दिया। उनका चित्त योगमार्गमें स्थित हो गया था। इसलिये वहाँ उन्हें पतिके चरणोंके अतिरिक्त और कुछ नहीं दिखायी दिया। मुनिश्रेष्ठ! सतीका निष्पाप शरीर तत्काल गिरा और उनकी इच्छाके अनुसार योगाग्निसे जलकर उसी क्षण भस्म हो गया। उस समय वहाँ आये हुए देवता आदिने जब यह घटना देखी, तब वे बड़े जोरसे हाहाकार करने लगे। उनका वह महान्, अद्भुत, विचित्र एवं भयंकर हाहाकार आकाशमें और पृथ्वीतलपर सब ओर फैल गया। लोग कह रहे थे—‘हाय! महान् देवता भगवान् शंकरकी परम प्रेयसी सतीदेवीने किस दुष्टके दुर्व्यवहारसे कुपित हो अपने प्राण त्याग दिये। अहो! ब्रह्माजीके पुत्र इस दक्षकी बड़ी भारी दुष्टता तो देखो। सारा चराचर जगत् जिसकी संतान है, उसीकी पुत्री मनस्विनी सतीदेवी, जो सदा ही मान पानेके योग्य थीं, उसके द्वारा ऐसी निरादृत हुईं कि प्राणोंसे ही हाथ धो बैठीं। भगवान् वृषभध्वजकी प्रिया सती सदा सभी सत्पुरुषोंके द्वारा निरन्तर सम्मान पानेकी अधिकारिणी थीं। वास्तवमें उसका हृदय बड़ा ही असहिष्णु है। वह प्रजापति दक्ष ब्राह्मणद्रोही है। इसलिये सारे संसारमें उसे महान् अपयश प्राप्त होगा। उसकी अपनी ही पुत्री उसीके अपराधसे जब प्राणत्याग करनेको उद्यत हो गयी, तब भी उस महानरकभोगी शंकरद्रोहीने उसे रोकातक नहीं!’

जिस समय सब लोग ऐसा कह रहे थे, उसी समय शिवजीके पार्षद सतीका यह अद्भुत प्राणत्याग देख तुरंत ही क्रोधपूर्वक अस्त्र-शस्त्र ले दक्षको मारनेके लिये उठ खड़े हुए। यज्ञमण्डपके द्वारपर खड़े हुए वे भगवान् शंकरके समस्त साठ हजार पार्षद, जो बड़े भारी बलवान् थे, अत्यन्त रोषसे भर गये और ‘हमें धिक्कार है, धिक्कार है’, ऐसा कहते हुए भगवान् शंकरके गणोंके वे सभी वीर यूथपति बारंबार उच्चस्वरसे हाहाकार करने लगे। देवर्षे! कितने ही पार्षद तो वहाँ शोकसे ऐसे व्याकुल हो गये कि वे अत्यन्त तीखे प्राणनाशक शस्त्रोंद्वारा अपने ही मस्तक और मुख आदि अंगोंपर आघात करने लगे। इस प्रकार बीस हजार पार्षद उस