शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
समय दक्षकन्या सतीके साथ ही नष्ट हो गये। वह एक अद्भुत-सी बात हुई। नष्ट होनेसे बचे हुए महात्मा शंकरके वे प्रमथगण क्रोधयुक्त दक्षको मारनेके लिये हथियार लिये उठ खड़े हुए। मुने! उन आक्रमणकारी पार्षदोंका वेग देखकर भगवान् भृगुने यज्ञमें विघ्न डालनेवालोंका नाश करनेके लिये नियत 'अपहता असुराः रक्षांसि वेदिषदः' इस यजुर्मन्त्रसे दक्षिणाग्निमें आहुति दी। भृगुके आहुति देते ही यज्ञकुण्डसे ऋभु नामक सहस्रों महान् देवता, जो बड़े प्रबल वीर थे, वहाँ प्रकट हो गये। मुनीश्वर! उन सबके हाथमें जलती हुई लकड़ियाँ थीं। उनके साथ प्रमथगणोंका अत्यन्त विकट युद्ध हुआ, जो सुननेवालोंके भी रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। उन ब्रह्मतेजसे सम्पन्न महावीर ऋभुओंकी सब ओरसे ऐसी मार पड़ी, जिससे प्रमथगण बिना अधिक प्रयासके ही भाग खड़े हुए। इस प्रकार उन देवताओंने उन शिवगणोंको तुरंत मार भगाया। यह अद्भुत-सी घटना भगवान् शिवकी महाशक्तिमती इच्छासे ही हुई। वह सब देखकर ऋषि, इन्द्रादि देवता, मरुद्गण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार और लोकपाल चुप ही रहे। कोई सब ओरसे आ-आकर वहाँ भगवान् विष्णुसे प्रार्थना करते थे कि किसी तरह विघ्न टल जाय। वे उद्विग्न हो बारंबार विघ्न-निवारणके लिये आपसमें सलाह करने लगे। प्रमथगणोंके नाश होने और भगाये जानेसे जो भावी परिणाम होनेवाला था, उसका भलीभाँत विचार करके उत्तम बुद्धिवाले श्रीविष्णु आदि देवता अत्यन्त उद्विग्न हो उठे थे। मुने! इस प्रकार दुरात्मा शंकर-द्रोही ब्रह्मबन्धु दक्षके यज्ञमें उस समय बड़ा भारी विघ्न उपस्थित हो गया। (अध्याय ३०)
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आकाशवाणीद्वारा दक्षकी भर्त्सना, उनके विनाशकी सूचना तथा समस्त देवताओंको यज्ञमण्डपसे निकल जानेकी प्रेरणा
ब्रह्माजी कहते हैं—मुनीश्वर! इसी बीचमें वहाँ दक्ष तथा देवता आदिके सुनते हुए आकाशवाणीने यह यथार्थ बात कही— "रे-रे दुराचारी दक्ष! ओ दम्भाचारपरायण महामूढ़! यह तूने कैसा अनर्थकारी कर्म कर डाला? ओ मूर्ख! शिवभक्तराज दधीचिके कथनको भी तूने प्रामाणिक नहीं माना, जो तेरे लिये सब प्रकारसे आनन्ददायक और मंगलकारी था। वे ब्राह्मण देवता तुझे दुस्सह शाप देकर तेरी यज्ञशालासे निकल गये तो भी तुझ मूढ़ने अपने मनमें कुछ भी नहीं समझा। उसके बाद तेरे घरमें मंगलमयी सतीदेवी स्वतः पधारीं, जो तेरी अपनी ही पुत्री थीं; किंतु तूने उनका भी परम आदर नहीं किया! ऐसा क्यों हुआ? ज्ञानदुर्बल दक्ष! तूने सती और महादेवजीकी पूजा नहीं की, यह क्या किया? 'मैं ब्रह्माजीका बेटा हूँ' ऐसा समझकर तू व्यर्थ ही घमंडमें भरा रहता है और इसीलिये तुझपर मोह छा गया है। वे सतीदेवी ही सत्पुरुषोंकी आराध्या देवी हैं अथवा सदा आराधना करनेके योग्य हैं, वे समस्त पुण्योंका फल देनेवाली, तीनों लोकोंकी माता, कल्याणस्वरूपा और