शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* रुद्रसंहिता *
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भगवान् शंकरके आधे अंगमें निवास करनेवाली हैं। वे सती देवी ही पूजित होनेपर सदा सम्पूर्ण सौभाग्य प्रदान करनेवाली हैं। वे ही महेश्वरकी शक्ति हैं और अपने भक्तोंको सब प्रकारके मंगल देती हैं। वे सतीदेवी ही पूजित होनेपर सदा संसारका भय दूर करती हैं, मनोवांछित फल देती हैं तथा वे ही समस्त उपद्रवोंको नष्ट करनेवाली देवी हैं। वे सती ही सदा पूजित होनेपर कीर्ति और सम्पत्ति प्रदान करती हैं। वे ही पराशक्ति तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली परमेश्वरी हैं। वे सती ही जगत्को जन्म देनेवाली माता, जगत्की रक्षा करनेवाली अनादि शक्ति और प्रलयकालमें जगत्का संहार करनेवाली हैं। वे जगन्माता सती ही भगवान् विष्णुकी मातारूपसे सुशोभित होनेवाली तथा ब्रह्मा, इन्द्र, चन्द्र, अग्नि एवं सूर्यदेव आदिकी जननी मानी गयी हैं। वे सती ही तप, धर्म और दान आदिका फल देनेवाली हैं। वे ही शम्भुशक्ति महादेवी हैं तथा दुष्टोंका हनन करनेवाली परात्पर शक्ति हैं। ऐसी महिमावाली सतीदेवी जिनकी सदा प्रिय धर्मपत्नी हैं, उन भगवान् महादेवको तूने यज्ञमें भाग नहीं दिया ! अरे! तू कैसा मूढ़ और कुविचारी है।
"भगवान् शिव ही सबके स्वामी तथा परात्पर परमेश्वर हैं। वे समस्त देवताओंके सम्यक् सेव्य हैं और सबका कल्याण करनेवाले हैं। इन्हींके दर्शनकी इच्छासे सिद्ध पुरुष तपस्या करते हैं और इन्हींके साक्षात्कारकी अभिलाषा मनमें लेकर योगीलोग योग-साधनामें प्रवृत्त होते हैं। अनन्त धन-धान्य और यज्ञ-याग आदिका सबसे महान् फल यही बताया गया है कि भगवान् शंकरका दर्शन सुलभ हो। शिव ही जगत्का धारण-पोषण करनेवाले हैं। वे ही समस्त विद्याओंके पति एवं सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। आदिविद्याके श्रेष्ठ स्वामी और समस्त मंगलोंके भी मंगल वे ही हैं। दुष्ट दक्ष ! तूने उनकी शक्तिका आज सत्कार नहीं किया है। इसीलिये इस यज्ञका विनाश हो जायगा। पूजनीय व्यक्तियोंकी पूजा न करनेसे अमंगल होता ही है। तूने परम पूज्य शिवस्वरूपा सतीका पूजन नहीं किया है। शेषनाग अपने सहस्र मस्तकोंसे प्रतिदिन प्रसन्नतापूर्वक जिनके चरणोंकी रज धारण करते हैं, उन्हीं भगवान् शिवकी शक्ति सतीदेवी थीं। जिनके चरणकमलोंका निरन्तर ध्यान और सादर पूजन करके ब्रह्माजी ब्रह्मत्वको प्राप्त हुए हैं, उन्हीं भगवान् शिवकी प्रिय पत्नी सतीदेवी थीं। जिनके चरणकमलोंका निरन्तर ध्यान और सादर पूजन करके इन्द्र आदि लोकपाल अपने-अपने उत्तम पदको प्राप्त हुए हैं, वे भगवान् शिव सम्पूर्ण जगत्के पिता हैं और शक्तिस्वरूपा सतीदेवी जगत्की माता कही गयी हैं। मूढ़ दक्ष ! तूने उन माता-पिताका सत्कार नहीं किया, फिर तेरा कल्याण कैसे होगा।
"तुझपर दुर्भाग्यका आक्रमण हो गया और विपत्तियाँ टूट पड़ीं; क्योंकि तूने उन भवानी सती और भगवान् शंकरकी भक्ति-भावसे आराधना नहीं की। 'कल्याणकारी शम्भुका पूजन न करके भी मैं कल्याणका भागी हो सकता हूँ' यह तेरा कैसा गर्व है? वह दुर्वार गर्व आज नष्ट हो जायगा। इन देवताओंमेंसे कौन ऐसा है, जो सर्वेश्वर शिवसे विमुख होकर तेरी सहायता करेगा?