भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* रुद्रसंहिता * २२१

ही छोड़ना। वीर! वहाँ दक्ष आदि सब लोगोंको पत्नी और बन्धु-बान्धवोंसहित जलाकर (कलशोंमें रखे हुए) जलको लीलापूर्वक पी जाना।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! जो वैदिक मर्यादाके पालक, कालके भी शत्रु तथा सबके ईश्वर हैं, वे भगवान् रुद्र रोषसे लाल आँखें किये महावीर वीरभद्रसे ऐसा कहकर चुप हो गये।
(अध्याय ३२)
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प्रमथगणोंसहित वीरभद्र और महाकालीका दक्षयज्ञ-विध्वंसके लिये प्रस्थान, दक्ष तथा देवताओंको अपशकुन एवं उत्पातसूचक लक्षणोंका दर्शन एवं भय होना

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! महेश्वरके इस वचनको आदरपूर्वक सुनकर वीरभद्र बहुत संतुष्ट हुए। उन्होंने महेश्वरको प्रणाम किया। तत्पश्चात् उन देवाधिदेव शूलीकी उपर्युक्त आज्ञाको शिरोधार्य करके वीरभद्र वहाँसे शीघ्र ही दक्षके यज्ञमण्डपकी ओर चले। भगवान् शिवने केवल शोभाके लिये उनके साथ करोड़ों महावीर गणोंको भेज दिया, जो प्रलयाग्निके समान तेजस्वी थे। वे कौतूहलकारी प्रबल वीर प्रमथगण वीर-भद्रके आगे और पीछे भी चल रहे थे। कालके भी काल भगवान् रुद्रके वीरभद्र-सहित जो लाखों पार्षदगण थे, उन सबका स्वरूप रुद्रके ही समान था। उन गणोंके साथ महात्मा वीरभद्र भगवान् शिवके समान ही वेश-भूषा धारण किये रथपर बैठकर यात्रा कर रहे थे। उनके एक सहस्र भुजाएँ थीं। शरीरमें नागराज लिपटे हुए थे। वीरभद्र बड़े प्रबल और भयंकर दिखायी देते थे। उनका रथ बहुत ही विशाल था। उसमें दस हजार सिंह जोते जाते थे, जो प्रयत्नपूर्वक उस रथको खींचते थे। उसी प्रकार बहुत-से प्रबल सिंह, शार्दूल, मगर, मत्स्य और सहस्रों हाथी उस रथके पार्श्वभागकी रक्षा करते थे। काली, कात्यायनी, ईशानी, चामुण्डा, मुण्डमर्दिनी, भद्रकाली, भद्रा, त्वरिता तथा वैष्णवी—इन नव दुर्गाओंके साथ तथा समस्त भूतगणोंके साथ महाकाली दक्षका विनाश करनेके लिये चलीं। डाकिनी, शाकिनी, भूत, प्रमथ, गुह्यक, कूष्माण्ड, पर्पट, चटक, ब्रह्मराक्षस, भैरव तथा क्षेत्रपाल आदि—ये सभी वीर भगवान् शिवकी आज्ञाका पालन एवं दक्षके यज्ञका विनाश करनेके लिये तुरंत चल दिये। इनके सिवा चौंसठ गणोंके साथ योगिनियोंका मण्डल भी सहसा कुपित हो दक्षयज्ञका विनाश करनेके लिये वहाँसे प्रस्थित हुआ। इस प्रकार कोटि-कोटि गण एवं विभिन्न प्रकारके गणाधीश वीरभद्रके साथ चले। उस समय भेरियोंकी गम्भीर ध्वनि होने लगी। नाना प्रकारके शब्द करनेवाले शंख बज उठे। भिन्न-भिन्न प्रकारकी सींगें बजने लगीं। महामुने! सेनासहित वीरभद्रकी यात्राके समय वहाँ बहुत-से सुखद शकुन होने लगे।

इस प्रकार जब प्रमथगणोंसहित