भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 237, कुल 850 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 237

* रुद्रसंहिता * २२३

शिवतत्त्वके ज्ञाता श्रीहरि दक्षको समझाते हुए बोले।

श्रीहरिने कहा—दक्ष! मैं तुमसे तत्त्वकी बात बता रहा हूँ। तुम मेरी बात ध्यान देकर सुनो। मेरा यह वचन तुम्हारे लिये सर्वथा हितकर तथा महामन्त्रके समान सुखदायक होगा। दक्ष! तुम्हें तत्त्वका ज्ञान नहीं है। इसलिये तुमने सबके अधिपति परमात्मा शंकरकी अवहेलना की है। ईश्वरकी अवहेलनासे सारा कार्य सर्वथा निष्फल हो जाता है। केवल इतना ही नहीं, पग-पगपर विपत्ति भी आती है। जहाँ अपूज्य पुरुषोंकी पूजा होती है और पूजनीय पुरुषकी पूजा नहीं की जाती, वहाँ दरिद्रता, मृत्यु तथा भय—ये तीन संकट अवश्य प्राप्त होंगे।* इसलिये सम्पूर्ण प्रयत्नसे तुम्हें भगवान् वृषभध्वजका सम्मान करना चाहिये। महेश्वरका अपमान करनेसे ही तुम्हारे ऊपर महान् भय उपस्थित हुआ है। हम सब लोग प्रभु होते हुए भी आज तुम्हारी दुर्नीतिके कारण जो संकट आया है, उसे टालनेमें समर्थ नहीं हैं। यह मैं तुमसे सच्ची बात कहता हूँ।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर दक्ष चिन्तामें डूब गये। उनके चेहरेका रंग उड़ गया और वे चुपचाप पृथ्वीपर खड़े रह गये। इसी समय भगवान् रुद्रके भेजे हुए गणनायक वीरभद्र अपनी सेनाके साथ यज्ञस्थलमें जा पहुँचे। वे सब-के-सब बड़े शूरवीर, निर्भय तथा रुद्रके समान ही पराक्रमी थे। भगवान् शंकरकी आज्ञासे आये हुए उन गणोंकी गणना असम्भव थी। वे वीरशिरोमणि रुद्रसैनिक जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे। उनके उस महानादसे तीनों लोक गूँज उठे। आकाश धूलसे ढक गया और दिशाएँ अन्धकारसे आवृत हो गयीं। सातों द्वीपोंसे युक्त पृथ्वी अत्यन्त भयसे व्याकुल हो पर्वत, वन और काननोंसहित काँपने लगी तथा सम्पूर्ण समुद्रोंमें ज्वार आ गया। इस प्रकार समस्त लोकोंका विनाश करनेमें समर्थ उस विशाल सेनाको देखकर समस्त देवता आदि चकित हो गये। सेनाके उद्योगको देख दक्षके मुँहसे खून निकल आया। वे अपनी स्त्रीको साथ


* ईश्वरावज्ञया सर्वं कार्यं भवति सर्वथा। विफलं केवलं नैव विपत्तिश्च पदे पदे॥
अपूज्या यत्र पूज्यन्ते पूजनीयो न पूज्यते। त्रीणि तत्र भविष्यन्ति दारिद्र्यं मरणं भयम्॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० ३५। ८-९)