शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
सहित समस्त लोकपाल बड़ी चिन्तामें पड़ गये। तब महावीर रुद्रगणोंसे घिरे हुए वीरभद्रने मन-ही-मन भगवान् शंकरका स्मरण करके इन्द्र आदि लोकपालोंको डाँटा और इसके पश्चात् रुद्रगणोंके नायक वीरभद्रने रोषसे भरकर तुरंत ही सम्पूर्ण देवताओंको तीखे बाणोंसे घायल कर दिया। उन बाणोंकी चोट खाकर इन्द्र आदि समस्त सुरेश्वर भागते हुए दसों दिशाओंमें चले गये। जब लोकपाल चले गये और देवता भाग खड़े हुए तब वीरभद्र अपने गणोंके साथ यज्ञशालाके समीप गये। उस समय वहाँ विद्यमान समस्त ऋषि अत्यन्त भयभीत हो परमेश्वर श्रीहरिसे रक्षाकी प्रार्थना करनेके लिये सहसा नतमस्तक हो शीघ्र बोले—'देवदेव! रमानाथ! सर्वेश्वर! महाप्रभो! आप दक्षके यज्ञकी रक्षा कीजिये। आप ही यज्ञ हैं, इसमें संशय नहीं है। यज्ञ आपका कर्म, रूप और अंग है। आप यज्ञके रक्षक हैं। अतः दक्ष-यज्ञकी रक्षा कीजिये। आपके सिवा दूसरा कोई इसका रक्षक नहीं है।'
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऋषियोंका यह वचन सुनकर मेरे सहित भगवान् विष्णु वीरभद्रके साथ युद्ध करनेकी इच्छासे चले। श्रीहरिको युद्धके लिये उद्यत देख शत्रुमर्दन वीरभद्र, जो वीर प्रमथगणोंसे घिरे हुए थे, कड़े शब्दोंमें भगवान् विष्णुको डाँटने लगे।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! वीरभद्रकी यह बात सुनकर बुद्धिमान् देवेश्वर विष्णु वहाँ प्रसन्नतापूर्वक हँसते हुए बोले।
श्रीविष्णुने कहा—वीरभद्र! आज तुम्हारे सामने मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे सुनो—मैं भगवान् शंकरका सेवक हूँ, तुम मुझे रुद्रदेवसे विमुख न कहो। दक्ष अज्ञानी है। कर्मकाण्डमें ही इसकी निष्ठा है। इसने मूढ़तावश पहले मुझसे बारंबार अपने यज्ञमें चलनेके लिये प्रार्थना की थी। मैं भक्तके अधीन ठहरा, इसलिये चला आया। भगवान् महेश्वर भी भक्तके अधीन रहते हैं। तात! दक्ष मेरा भक्त है। इसीलिये मुझे यहाँ आना पड़ा है। रुद्रके क्रोधसे उत्पन्न हुए वीर! तुम रुद्र-तेजःस्वरूप हो, उत्तम प्रतापके आश्रय हो, मेरी प्रतिज्ञा सुनो। मैं तुम्हें आगे बढ़नेसे रोकता हूँ और तुम मुझे रोको। परिणाम वही होगा, जो होनेवाला होगा। मैं पराक्रम करूँगा।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर महाबाहु वीरभद्र हँसकर बोला—'आप मेरे प्रभुके प्रिय भक्त हैं, यह जानकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है।' इतना कहकर गणनायक वीरभद्र हँस पड़ा और विनयसे नतमस्तक हो बड़ी प्रसन्नताके साथ श्रीविष्णुदेवसे कहने लगा।
वीरभद्रने कहा—महाप्रभो! मैंने आपके भावकी परीक्षाके लिये कड़ी बातें कही थीं। इस समय यथार्थ बात कहता हूँ, सावधान होकर सुनो। हरे! जैसे शिव हैं, वैसे आप हैं। जैसे आप हैं, वैसे शिव हैं। ऐसा वेद कहते हैं और वेदोंका यह कथन शिवकी आज्ञाके अनुसार ही है।* रमानाथ! भगवान् शिवकी आज्ञासे हम
* यथा शिवस्तथा त्वं हि यथा त्वं च तथा शिवः। इति वेदा वर्णयन्ति शिवशासनतो हरे॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० ३६। ६६)
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