शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* रुद्रसंहिता * २२७
सब लोग उनके सेवक ही हैं; तथापि मैंने जो बात कही है, वह इस वाद-विवादके अवसरके अनुरूप ही है। आप मेरी हर बातको आपके प्रति आदरके भावसे ही कही गयी समझिये।
ब्रह्माजी कहते हैं—वीरभद्रका यह वचन सुनकर भगवान् श्रीहरि हँस पड़े और उसके लिये हितकर वचन बोले।
श्रीविष्णुने कहा—महावीर! तुम मेरे साथ निःशंक होकर युद्ध करो। तुम्हारे अस्त्रोंसे शरीरके भर जानेपर ही मैं अपने आश्रमको जाऊँगा।
ब्रह्माजी कहते हैं—ऐसा कहकर भगवान् विष्णु चुप हो गये और युद्धके लिये कमर कसकर डट गये। महाबली वीरभद्र भी अपने गणोंके साथ युद्धके लिये तैयार हो गये।
नारद! तदनन्तर भगवान् विष्णु और वीरभद्रमें घोर युद्ध हुआ। अन्तमें वीरभद्रने भगवान् विष्णुके चक्रको स्तम्भित कर दिया तथा शार्ङ्गधनुषके तीन टुकड़े कर डाले। तब मेरे द्वारा एवं सरस्वतीद्वारा बोधित हुए श्रीविष्णुने उस महान् गणनायक वीरभद्रको असह्य तेजसे सम्पन्न जानकर वहाँसे अन्तर्धान होनेका विचार किया। दूसरे देवता भी यह जान गये कि सतीके प्रति जो अन्याय हुआ है, उसीका यह सब भावी परिणाम है। दूसरोंके लिये इस संकटका सामना करना अत्यन्त कठिन है। यह जानकर वे सब देवता अपने सेवकोंके साथ स्वतन्त्र सर्वेश्वर शिवका स्मरण करके अपने-अपने लोकको चले गये। मैं भी पुत्रके दुःखसे पीड़ित हो सत्यलोकमें चला आया और अत्यन्त दुःखसे आतुर हो सोचने लगा कि अब मुझे क्या करना चाहिये। मेरे तथा श्रीविष्णुके चले जानेपर मुनियोंसहित समस्त यज्ञके आधार रहनेवाले देवता शिवगणोंद्वारा पराजित हो भाग गये। उस उपद्रवको देखकर और उस महामखका विध्वंस निकट जानकर वह यज्ञ भी अत्यन्त भयभीत हो मृगका रूप धारण करके वहाँसे भागा। मृगके रूपमें आकाशकी ओर भागते देख वीरभद्रने उसे पकड़ लिया और उसका मस्तक काट डाला। फिर उन्होंने मुनियों तथा देवताओंके अंग-भंग कर दिये और बहुतोंको मार डाला।
प्रतापी मणिभद्रने भृगुको उठाकर पटक दिया और उनकी छातीको पैरसे दबाकर तत्काल उनकी दाढ़ी-मूँछ नोच ली। चण्डने बड़े वेगसे पूषाके दाँत उखाड़ लिये; क्योंकि पूर्वकालमें जिस समय महादेवजीको दक्षके द्वारा गालियाँ दी जा रही थीं, उस समय वे दाँत दिखा-दिखाकर हँसे थे। नन्दीने भगको रोषपूर्वक पृथ्वीपर दे मारा और उनकी दोनों आँखें निकाल लीं; क्योंकि जब दक्ष शिवजीको शाप दे रहे थे, उस समय वे आँखोंके संकेतसे अपना अनुमोदन सूचित कर रहे थे। वहाँ रुद्रगणनायकोंने स्वधा, स्वाहा और दक्षिणा देवियोंकी बड़ी विडम्बना (दुर्दशा) की। वहाँ जो मन्त्र-तन्त्र तथा दूसरे लोग थे, उनका भी बहुत तिरस्कार किया। ब्रह्मपुत्र दक्ष भयके मारे अन्तर्वेदीके भीतर छिप गये। वीरभद्र उनका पता लगाकर उन्हें बलपूर्वक पकड़ लाये। फिर उनके दोनों गाल पकड़कर उन्होंने उनके मस्तकपर तलवारसे आघात किया। परंतु योगके प्रभावसे दक्षका सिर अभेद्य हो गया था, इसलिये कट नहीं सका। जब वीरभद्रको
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