भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 850 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 242

२२८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

ज्ञात हुआ कि सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंसे इनके मस्तकका भेदन नहीं हो सकता, तब उन्होंने दक्षकी छातीपर पैर रखकर दबाया और दोनों हाथोंसे गर्दन मरोड़कर तोड़ डाली। फिर शिवद्रोही दुष्ट दक्षके उस सिरको गणनायक वीरभद्रने अग्निकुण्डमें डाल दिया। तदनन्तर जैसे सूर्य घोर अन्धकारराशिका नाश करके उदयाचलपर आरूढ़ होते हैं, उसी प्रकार वीरभद्र दक्ष और उनके यज्ञका विध्वंस करके कृतकार्य हो तुरंत ही वहाँसे उत्तम कैलास पर्वतको चले गये। वीरभद्रको काम पूरा करके आया देख परमेश्वर शिव मन-ही-मन बहुत संतुष्ट हुए और उन्होंने उन्हें वीर प्रमथ-गणोंका अध्यक्ष बना दिया।
(अध्याय ३६-३७)


श्रीविष्णुकी पराजयमें दधीचि मुनिके शापको कारण बताते हुए दधीचि और क्षुवके विवादका इतिहास, मृत्युंजय-मन्त्रके अनुष्ठानसे दधीचिकी अवध्यता तथा श्रीहरिका क्षुवको दधीचिकी पराजयके लिये यत्न करनेका आश्वासन

सूतजी कहते हैं—महर्षियो! अमित बुद्धिमान् ब्रह्माजीकी कही हुई यह कथा सुनकर द्विजश्रेष्ठ नारद विस्मयमें पड़ गये। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक प्रश्न किया।

नारदजीने पूछा—पिताजी! भगवान् विष्णु शिवजीको छोड़कर अन्य देवताओंके साथ दक्षके यज्ञमें क्यों चले गये, जिसके कारण वहाँ उनका तिरस्कार हुआ? क्या वे प्रलयकारी पराक्रमवाले भगवान् शंकरको नहीं जानते थे? फिर उन्होंने अज्ञानी पुरुषकी भाँति रुद्रगणोंके साथ युद्ध क्यों किया? करुणानिधे! मेरे मनमें यह बहुत बड़ा संदेह है। आप कृपा करके मेरे इस संशयको नष्ट कर दीजिये और प्रभो! मनमें उत्साह पैदा करनेवाले शिवचरितको कहिये।

ब्रह्माजीने कहा—नारद! पूर्वकालमें राजा क्षुवकी सहायता करनेवाले श्रीहरिको दधीचि मुनिने शाप दे दिया था, जिससे उस समय वे इस बातको भूल गये और वे दूसरे देवताओंको साथ ले दक्षके यज्ञमें चले गये। दधीचिने क्यों शाप दिया, यह सुनो। प्राचीनकालमें क्षुव नामसे प्रसिद्ध एक महातेजस्वी राजा हो गये हैं। वे महाप्रभावशाली मुनीश्वर दधीचिके मित्र थे। दीर्घकालकी तपस्याके प्रसंगसे क्षुव और दधीचिमें विवाद आरम्भ हो गया, जो तीनों लोकोंमें महान् अनर्थकारीके रूपमें विख्यात हुआ। उस विवादमें वेदके विद्वान् शिवभक्त दधीचि कहते थे कि शूद्र, वैश्य और क्षत्रिय—इन तीनों वर्णोंसे ब्राह्मण ही श्रेष्ठ है, इसमें संशय नहीं है। महामुनि दधीचिकी वह बात सुनकर धन-वैभवके मदसे मोहित हुए राजा क्षुवने उसका इस प्रकार प्रतिवाद किया।

क्षुव बोले—राजा इन्द्र आदि आठ लोकपालोंके स्वरूपको धारण करता है। वह समस्त वर्णों और आश्रमोंका पालक


789 संक्षिप्त शिवपुराण—8 D