भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 243
  • रुद्रसंहिता * २२९

एवं प्रभु है। इसलिये राजा ही सबसे श्रेष्ठ है। राजाकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति भी कहती है कि राजा सर्वदेवमय है। मुने! इस श्रुतिके कथनानुसार जो सबसे बड़ा देवता है, वह मैं ही हूँ। इस विवेचनसे ब्राह्मणकी अपेक्षा राजा ही श्रेष्ठ सिद्ध होता है। च्यवननन्दन! आप इस विषयमें विचार करें और मेरा अनादर न करें; क्योंकि मैं सर्वथा आपके लिये पूजनीय हूँ।

राजा क्षुवका यह मत श्रुतियों और स्मृतियोंके विरुद्ध था। इसे सुनकर भृगुकुलभूषण मुनिश्रेष्ठ दधीचिको बड़ा क्रोध हुआ। मुने! अपने गौरवका विचार करके कुपित हुए महातेजस्वी दधीचिने क्षुवके मस्तकपर बायें मुक्केसे प्रहार किया। उनके मुक्केकी मार खाकर ब्रह्माण्डके अधिपति कुत्सित बुद्धिवाले क्षुव अत्यन्त कुपित हो गरज उठे और उन्होंने वज्रसे दधीचिको काट डाला। उस वज्रसे आहत हो भृगुवंशी दधीचि पृथ्वीपर गिर पड़े। भार्गववंशधर दधीचिने गिरते समय शुक्राचार्यका स्मरण किया। योगी शुक्राचार्यने आकर दधीचिके शरीरको, जिसे क्षुवने काट डाला था, तुरंत जोड़ दिया। दधीचिके अंगोंको पूर्ववत् जोड़कर शिवभक्तशिरोमणि तथा मृत्युंजय-विद्याके प्रवर्तक शुक्राचार्यने उनसे कहा।

शुक्र बोले—तात दधीचि! मैं सर्वेश्वर भगवान् शिवका पूजन करके तुम्हें श्रुतिप्रतिपादित महामृत्युंजय नामक श्रेष्ठ मन्त्रका उपदेश देता हूँ।

‘त्र्यम्बकं यजामहे’—हम भगवान् त्र्यम्बकका यजन (आराधन) करते हैं। त्र्यम्बकका अर्थ है—तीनों लोकोंके पिता प्रभावशाली शिव। वे भगवान् सूर्य, सोम और अग्नि—तीनों मण्डलोंके पिता हैं। सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणोंके महेश्वर हैं। आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्व—इन तीन तत्त्वोंके; आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि—इन तीनों अग्नियोंके; सर्वत्र उपलब्ध होनेवाले पृथ्वी, जल एवं तेज—इन तीन मूर्त भूतोंके (अथवा सात्त्विक आदि भेदसे त्रिविध भूतोंके), त्रिदिव (स्वर्ग)-के, त्रिभुजके, त्रिधाभूत सबके ब्रह्मा, विष्णु और शिव—तीनों देवताओंके महान् ईश्वर महादेवजी ही हैं। (यहाँतक मन्त्रके प्रथम चरणकी व्याख्या हुई।) मन्त्रका द्वितीय चरण है—'सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्'—जैसे फूलोंमें उत्तम गन्ध होती है, उसी प्रकार वे भगवान् शिव सम्पूर्ण भूतोंमें, तीनों गुणोंमें, समस्त कृत्योंमें, इन्द्रियोंमें, अन्यान्य देवोंमें और गणोंमें उनके प्रकाशक सारभूत आत्माके रूपमें व्याप्त हैं, अतएव सुगन्धयुक्त एवं सम्पूर्ण देवताओंके ईश्वर हैं। (यहाँतक 'सुगन्धिम्' पदकी व्याख्या हुई। अब 'पुष्टिवर्धनम्' की व्याख्या करते हैं—) उत्तम व्रतका पालन करनेवाले द्विजश्रेष्ठ! महामुने नारद! उन अन्तर्यामी पुरुष शिवसे प्रकृतिका पोषण होता है—महत्तत्त्वसे लेकर विशेष-पर्यन्त सम्पूर्ण विकल्पोंकी पुष्टि होती है तथा मुझ ब्रह्माका, विष्णुका, मुनियोंका और इन्द्रियोंसहित देवताओंका भी पोषण होता है, इसलिये वे ही 'पुष्टिवर्धन' हैं। (अब मन्त्रके तीसरे और चौथे चरणकी व्याख्या करते हैं।) उन दोनों चरणोंका स्वरूप यों है—उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्यो-र्मुक्षीयमामृतात्—अर्थात् 'प्रभो! जैसे खरबूजा पक जानेपर लताबन्धनसे छूट जाता है, उसी तरह मैं मृत्युरूप बन्धनसे मुक्त हो