शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३० * संक्षिप्त शिवपुराण *
जाऊँ, अमृतपद (मोक्ष)-से पृथक् न होऊँ।' वे रुद्रदेव अमृतस्वरूप हैं; जो पुण्यकर्मसे, तपस्यासे, स्वाध्यायसे, योगसे अथवा ध्यानसे उनकी आराधना करता है, उसे नूतन जीवन प्राप्त होता है। इस सत्यके प्रभावसे भगवान् शिव स्वयं ही अपने भक्तको मृत्युके सूक्ष्म बन्धनसे मुक्त कर देते हैं; क्योंकि वे भगवान् ही बन्धन और मोक्ष देनेवाले हैं—ठीक उसी तरह, जैसे 'उर्वारुक अर्थात् ककड़ीका पौधा अपने फलको स्वयं ही लताके बन्धनमें बाँधे रखता है और पक जानेपर स्वयं ही उसे बन्धनसे मुक्त कर देता है।'
यह मृतसंजीवनी मन्त्र है, जो मेरे मतसे सर्वोत्तम है। तुम प्रेमपूर्वक नियमसे भगवान् शिवका स्मरण करते हुए इस मन्त्रका जप करो। जप और हवनके पश्चात् इसीसे अभिमन्त्रित किये हुए जलको दिन और रातमें पीओ तथा शिव-विग्रहके समीप बैठकर उन्हींका ध्यान करते रहो। इससे कहीं भी मृत्युका भय नहीं रहता। न्यास आदि सब कार्य करके विधिवत् भगवान् शिवकी पूजा करो। यह सब करके शान्तभावसे बैठकर भक्तवत्सल शंकरका ध्यान करना चाहिये। मैं भगवान् शिवका ध्यान बता रहा हूँ, जिसके अनुसार उनका चिन्तन करके मन्त्र-जप करना चाहिये। इस तरह निरन्तर जप करनेसे बुद्धिमान् पुरुष भगवान् शिवके प्रभावसे उस मन्त्रको सिद्ध कर लेता है।
मृत्युंजयका ध्यान
हस्ताम्भोजयुगस्थकुम्भयुगलादुद्धृत्य तोयं शिरः
सिञ्चन्तं करयोर्युगेन दधतं स्वाङ्के सकुम्भौ करौ।
अक्षस्रङ्मृगहस्तमम्बुजगतं मूर्धस्थचन्द्रस्रवत्
पीयूषार्द्रतनुं भजे सगिरिजं त्र्यक्षं च मृत्युञ्जयम्॥
जो अपने दो करकमलोंमें रखे हुए दो कलशोंसे जल निकालकर उनसे ऊपरवाले दो हाथोंद्वारा अपने मस्तकको सींचते हैं। अन्य दो हाथोंमें दो घड़े लिये उन्हें अपनी गोदमें रखे हुए हैं तथा शेष दो हाथोंमें रुद्राक्ष एवं मृगमुद्रा धारण करते हैं, कमलके आसनपर बैठे हैं, सिरपर स्थित चन्द्रमासे निरन्तर झरते हुए अमृतसे जिनका सारा शरीर भींगा हुआ है तथा जो तीन नेत्र धारण करनेवाले हैं, उन भगवान् मृत्युंजयका, जिनके साथ गिरिराजनन्दिनी उमा भी विराजमान हैं, मैं भजन (चिन्तन) करता हूँ।
ब्रह्माजी कहते हैं—तात! मुनिश्रेष्ठ दधीचिको इस प्रकार उपदेश देकर शुक्राचार्य भगवान् शंकरका स्मरण करते हुए अपने स्थानको लौट गये। उनकी वह बात सुनकर महामुनि दधीचि बड़े प्रेमसे शिवजीका स्मरण करते हुए तपस्याके लिये वनमें गये। वहाँ जाकर उन्होंने विधि-पूर्वक महामृत्युंजय-मन्त्रका जप और प्रेम-पूर्वक भगवान् शिवका चिन्तन करते हुए तपस्या प्रारम्भ की। दीर्घकालतक उस मन्त्रका जप और तपस्याद्वारा भगवान् शंकरकी आराधना करके दधीचिने महामृत्युंजय शिवको संतुष्ट किया। महामुने! उस जपसे प्रसन्नचित्त हुए भक्तवत्सल भगवान् शिव दधीचिके प्रेमवश उनके सामने प्रकट हो गये। अपने प्रभु शम्भुका साक्षात् दर्शन करके मुनीश्वर दधीचिको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने विधिपूर्वक प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़ भक्तिभावसे शंकरका स्तवन किया। तात! मुने! तदनन्तर मुनिके प्रेमसे प्रसन्न हुए शिवने च्यवनकुमार दधीचिसे कहा—"तुम