भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२३६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

भस्म आदिसे उनके अंगोंकी बड़ी शोभा हो रही थी। भगवान् शिव अपने वत्सल स्वभावके कारण सारे संसारके सुहृद् हैं। नारद! उस दिन वे एक कुशासनपर बैठे थे और सब संतोंके सुनते हुए तुम्हारे प्रश्न करनेपर तुम्हें उत्तम ज्ञानका उपदेश दे रहे थे। वे बायाँ चरण अपनी दायीं जाँघपर और बायाँ हाथ बायें घुटनेपर रखे, कलाईमें रुद्राक्षकी माला डाले सुन्दर तर्कमुद्रा*-से विराजमान थे।

इस रूपमें भगवान् शिवका दर्शन करके उस समय विष्णु आदि सब देवताओंने दोनों हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर तुरंत उनके चरणोंमें प्रणाम किया। मेरे साथ भगवान् विष्णुको आया देख सत्पुरुषोंके आश्रयदाता भगवान् रुद्र उठकर खड़े हो गये और उन्होंने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम भी किया। फिर विष्णु आदि सब देवताओंने जब भगवान् शिवको प्रणाम कर लिया, तब उन्होंने मुझे नमस्कार किया—ठीक उसी तरह, जैसे लोकोंको उत्तम गति प्रदान करनेवाले भगवान् विष्णु प्रजापति कश्यपको प्रणाम करते हैं। तत्पश्चात् देवताओं, सिद्धों, गणाधीशों और महर्षियोंसे नमस्कृत तथा स्वयं भी (श्रीविष्णुको एवं मुझको) नमस्कार करनेवाले भगवान् शिवसे श्रीहरिने आदरपूर्वक वार्तालाप आरम्भ किया।

(अध्याय ४०)


देवताओंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति, भगवान् शिवका देवता आदिके अंगोंके ठीक होने और दक्षके जीवित होनेका वरदान देना, श्रीहरि आदिके साथ यज्ञमण्डपमें पधारकर शिवका दक्षको जीवित करना तथा दक्ष और विष्णु आदिके द्वारा उनकी स्तुति

देवताओंने भगवान् शिवजीकी अत्यन्त विनयके साथ स्तुति करते हुए अन्तमें कहा— आप पर (उत्कृष्ट), परमेश्वर, परात्पर तथा परात्परतर हैं। आप सर्वव्यापी विश्वमूर्ति महेश्वरको नमस्कार है। आप विष्णुकलत्र, विष्णुक्षेत्र, भानु, भैरव, शरणागतवत्सल, त्र्यम्बक तथा विहरणशील हैं। आप मृत्युंजय हैं। शोक भी आपका ही रूप है, आप त्रिगुण एवं गुणात्मा हैं। चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि आपके नेत्र हैं। आप सबके कारण तथा धर्ममर्यादास्वरूप हैं। आपको नमस्कार है। आपने अपने ही तेजसे सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है। आप निर्विकार, प्रकाशपूर्ण, चिदानन्दस्वरूप, परब्रह्म परमात्मा हैं। महेश्वर ! ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र और चन्द्र आदि समस्त देवता तथा मुनि आपसे ही उत्पन्न हुए हैं। चूँकि आप अपने शरीरको आठ भागोंमें विभक्त करके समस्त संसारका पोषण करते हैं, इसलिये अष्टमूर्ति कहलाते हैं। आप ही सबके आदिकारण


* तर्जनीको अँगूठेसे जोड़कर और अन्य अँगुलियोंको आपसमें मिलाकर फैला देनेसे जो बन्ध सिद्ध होता है, उसे 'तर्कमुद्रा' कहते हैं। इसीका नाम ज्ञानमुद्रा भी है।