शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* रुद्रसंहिता * २३७
करुणामय ईश्वर हैं। आपके भयसे यह वायु चलती है। आपके भयसे अग्नि जलानेका काम करती है, आपके भयसे सूर्य तपता है और आपके ही भयसे मृत्यु सब ओर दौड़ती फिरती है। दयासिन्धो! महेशान! परमेश्वर! प्रसन्न होइये। हम नष्ट और अचेत हो रहे हैं। अतः सदा ही हमारी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। नाथ! करुणानिधे! शम्भो! आपने अबतक नाना प्रकारकी आपत्तियोंसे जिस तरह हमें सदा सुरक्षित रखा है, उसी तरह आज भी आप हमारी रक्षा कीजिये। नाथ! दुर्गेश! आप शीघ्र कृपा करके इस अपूर्ण यज्ञका और प्रजापति दक्षका भी उद्धार कीजिये। भगको अपनी आँखें मिल जायें, यजमान दक्ष जीवित हो जायें, पूषाके दाँत जम जायँ और भृगुकी दाढ़ी-मूँछ पहले-जैसी हो जाय। शंकर! आयुधों और पत्थरोंकी वर्षासे जिनके अंग भंग हो गये हैं, उन देवता आदिपर आप सर्वथा अनुग्रह करें, जिससे उन्हें पूर्णतः आरोग्य लाभ हो। नाथ! यज्ञकर्म पूर्ण होनेपर जो कुछ शेष रहे, वह सब आपका पूरा-पूरा भाग हो (उसमें और कोई हस्तक्षेप न करे)। रुद्रदेव! आपके भागसे ही यज्ञ पूर्ण हो, अन्यथा नहीं।
ऐसा कहकर मुझ ब्रह्माके साथ सभी देवता अपराध क्षमा करानेके लिये उद्यत हो हाथ जोड़ भूमिपर दण्डके समान पड़ गये।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! मुझ ब्रह्मा, लोकपाल, प्रजापति तथा मुनियोंसहित श्रीपति विष्णुके अनुनय-विनय करनेपर परमेश्वर शिव प्रसन्न हो गये। देवताओंको आश्वासन दे हँसकर उनपर परम अनुग्रह करते हुए करुणानिधान परमेश्वर शिवने कहा।
श्रीमहादेवजी बोले—सुरश्रेष्ठ ब्रह्मा और विष्णुदेव! आप दोनों सावधान होकर मेरी बात सुनें, मैं सच्ची बात कहता हूँ। तात! आप दोनोंकी सभी बातोंको मैंने सदा माना है। दक्षके यज्ञका यह विध्वंस मैंने नहीं किया है। दक्ष स्वयं ही दूसरोंसे द्वेष करते हैं। दूसरोंके प्रति जैसा बर्ताव किया जायगा, वह अपने लिये ही फलित होगा। अतः ऐसा कर्म कभी नहीं करना चाहिये, जो दूसरोंको कष्ट देनेवाला हो।* दक्षका मस्तक जल गया है, इसलिये इनके सिरके स्थानमें बकरेका सिर जोड़ दिया जाय; भग देवता मित्रकी आँखसे अपने यज्ञभागको देखें। तात! पूषा नामक देवता, जिनके दाँत टूट गये हैं, यजमानके दाँतोंसे भलीभाँति पिसे गये यज्ञान्नका भक्षण करें। यह मैंने सच्ची बात बतायी है। मेरा विरोध करनेवाले भृगुकी दाढ़ीके स्थानमें बकरेकी दाढ़ी लगा दी जाय। शेष सभी देवताओंके, जिन्होंने मुझे यज्ञभागके रूपमें यज्ञकी अवशिष्ट वस्तुएँ दी हैं, सारे अंग पहलेकी भाँति ठीक हो जायँ। अध्वर्यु आदि याज्ञिकोंमेंसे, जिनकी भुजाएँ टूट गयी हैं, वे अश्विनीकुमारोंकी भुजाओंसे और जिनके हाथ नष्ट हो गये हैं, वे पूषाके हाथोंसे अपने काम चलायें। यह मैंने आपलोगोंके प्रेमवश कहा है।
* परं द्वेष्टि परेषां यदात्मनस्तद्भविष्यति ॥ परेषां क्लेदनं कर्म न कार्यं तत्कदाचन।
(शि० पु० रु० सं० स० खं० ४२। ५-६)